कविता : अपना साया

अपना साया, बेपनाह होकर हमारे साथ तुम सोयी यह यक़ीनन सबसे बड़ी मुहब्बत आधे पहर हम साथ रहते चुप होकर नींद में तब बातें किया करते सबको भूल जाते अपने पास आते तुमसे इस वक्त कभी कुछ भी नहीं छिपाते… राजीव कुमार झा की कलम से…

बेकरार सब हो गये
फासले सिमटते हुए
करीब आकर
हम खो गये
बेतकल्लुफी की बातें
तुम अक्सर करती रही
यादों का सिलसिला
सिमटता चला जाता
बीता वक्त याद आता

बेपनाह होकर
हमारे साथ तुम सोयी
यह यक़ीनन
सबसे बड़ी मुहब्बत
आधे पहर हम साथ
रहते
चुप होकर नींद में
तब बातें किया करते
सबको भूल जाते
अपने पास आते

तुमसे इस वक्त कभी
कुछ भी नहीं छिपाते
चांद के पास आकर
यह बात हम तुमको
बताते
तब गुमसुम जंगल
सुबह अंधेरे से
बाहर निकल आता

सूरज सभी दिशाओं में
मुसकुराता
यह जिंदगी का
फलसफा
रोज गुजरता गया
सबकुछ इस राह में

सिमटता जा रहा
अपना साया सदा साथ
चलता
यहां हर वक्त देता दिखाई

हिंदू परिवार ने घर में बना रखी थी मजार


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अपना साया, बेपनाह होकर हमारे साथ तुम सोयी यह यक़ीनन सबसे बड़ी मुहब्बत आधे पहर हम साथ रहते चुप होकर नींद में तब बातें किया करते सबको भूल जाते अपने पास आते तुमसे इस वक्त कभी कुछ भी नहीं छिपाते... राजीव कुमार झा की कलम से

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