कविता : सच्ची होली

लाल -गुलाल सा हर हृदय रंगे और मॅंहके तब हो सच्ची होली। मन में द्वेष, बैर -भाव जो रहा भरा फिर कोरी की कोरी होली हृदय से हृदय जो रंग जाये तब हो सच्ची होली। #मुकेश कुमार ऋषि वर्मा, आगरा, उत्तर प्रदेश

तन रॅंगा बहुतों ने
मन जो रॅंगे
तब हो सच्ची होली।

बेशक ! कपड़े- लत्ते न भींगे
जब मन भींगे
तब हो सच्ची होली।

जात-पात का भेद मिटे
ऊंच-नीच का भाव हटे
तब हो सच्ची होली।

लाल -गुलाल सा
हर हृदय रंगे और मॅंहके
तब हो सच्ची होली।

मन में द्वेष, बैर -भाव जो रहा भरा
फिर कोरी की कोरी होली
हृदय से हृदय जो रंग जाये
तब हो सच्ची होली।


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