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कलमकार की कलम से…

कलमकार की कलम से… जब आप रचनात्मक मिशन पर सजगता के साथ चलते है तो कही न कही से किसी न किसी रूप में हमें प्रोत्साहन अवश्य ही मिलता है और यही प्रोत्साहन हमें अपनी मंजिल पर ले जाता हैं। #सुनील कुमार माथुर, जोधपुर, राजस्थान

कलमकार की कलम स्पष्ट और सपाट होती है। चूंकि वह जब चलती है तब अनेक पाठकों का मनोरंजन करते हुए चलती हैं। वह पवित्र और निर्मल होती है। गंगा की तरह पवित्र। कलमकार का उद्देश्य समाज में व्याप्त गंदगी का सफाया करना और एक स्वस्थ और स्वच्छ समाज का नव निर्माण करना होता है। कलमकार की कलम हर वक्त नहीं चलती हैं। श्रेष्ठ लेखन के लिए उसे गहन चिंतन मनन करना पडता हैं। शब्दों के चयन के लिए उसे शब्दों के भंडार में गोते लगाने पडते है तब कहीं जाकर धड़ल्ले से कलमकार की कलम चलती है। वह कोई देवता नहीं है जो सबको संतुष्ट कर सके।

बस जब लेखनी में सच्चाई है तो फिर कहीं भी किन्तु परन्तु की गुंजाइश नहीं रहती है। मगर अफसोस इस बात का है कि कलमकार को पाठक आज प्रोत्साहन कम ही देते है। ज्यादातर पाठक पढ कर भी यहीं कहते है कि बकवास है। अब उन्हें कौन समझाए कि बकवास था तो फिर पूरा आलेख क्यों पढा। इस दुनियां की रीत है कि किसी के श्रेष्ठ कार्य की प्रशंसा न करना या दबी जुबान से प्रशंसा करते हैं किसी के श्रेष्ठ कार्य पर प्रशंसा करना, सराहना करना, कार्य की श्रेष्ठता पर दो शब्द बोलने में हमें शर्म आती है। लेकिन उसी प्रतिभा के परलोक सिधार जाने पर न जाने लोग ढ़ेरों तरह से अपने विचारों को व्यक्त करते हैं। यह कहां की बुद्धिमानी है। अरे, कुछ भी कहना हो तो मुख पर कहिए । पीठ पीछे तो हर कोई कहता हैं।

12 जून 2024 को व्हाट्सएप पर पुराने पत्रकारों के लेखन पर चर्चा चल रही थी। तभी सभी पुराने व वरिष्ठ पत्रकारों का स्मरण करते हुए पत्रकारों ने इस कलमकार (सुनील कुमार माथुर) की चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार जोशी ने अपनी टिप्पणी करते हुए कहा कि ग्रुप के सदस्य सुनील कुमार माथुर के नाम लोकमंच में सर्वाधिक समस्याओं को उजागर करने का शायद रिकार्ड है। इस पर दूसरे ने कहा कि ये नाम तो पट्टाधारी की तरह था जो हर दूसरे-तीसरे दिन इनके नाम के दर्शन तय थे। वरिष्ठ पत्रकार बंधुओं की कलम से करीब 4 दशक बाद इस तरह की बात पढी तो दिल बाग बाग हो गया और अच्छा भी लगा कि हमारे बंधु हमें आज भी याद करते है।

माथुर की एक कविता वाह रे, कायस्थ जगत वाह जब कायस्थ जगत पाक्षिक समाचार पत्र में प्रकाशित हुई तब कनाडा से अंजू माथुर ने लिखा कि उक्त कविता शानदार प्रस्तुति है और पढ़कर आनंद आ गया। देवभूमि समाचार पत्र के सम्पादक राजशेखर भट्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि सुनील कुमार माथुर ने अपने आलेखों और कविताओं के माध्यम से देवभूमि समाचार पत्र के पाठकों का मनोरंजन किया। नई नई ज्ञानवर्धक तथ्यों पर लेखन किया है। सामयिक और चिंतन योग्य आलेखों का लेखन किया है। इस प्रकार की टिप्पणी कीसी भी कलमकार के लिए एक अमूल्य निधि है जिसे कोई भी चोर चुरा नहीं सकता। मगर अफसोस इस बात का है कि लोग आज कमेंट्स करने से कतराते हैं। चूंकि जब से मोबाइल युग आया है तब से लोग कापी पेस्ट व फारवर्ड करने में ही लगे रहते है। खुद की सोच को हम भूल गए।



कभी भी किसी से अपनी तुलना न करे। अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढते रहे। न ही किसी की नकल करे। हर दिन हर क्षण नया सोचे। न ही जीवन में किसी पुरस्कार की चाह रखे।‌ वक्त आने पर सब कुछ स्वत : ही मिल जायेगा। शाबाश, दमदार, गज़ब, वाह क्या खूब, बहुत ही सुन्दर, प्रेरणादायक, ये कुछ ऐसे शब्द है जो किसी पुरस्कार, हौसला अफजाई से कम नहीं है। बस आप तो अपना रचनात्मक श्रेष्ठ कर्म करते रहिए। वक्त आने पर लोग आपके कार्यो की सराहना स्वत : ही करने लगेंगे। आपकों नगद राशि, प्रशस्ति-पत्र, शाल व श्रीफल, स्मृति चिन्ह भले ही अपने जीवन काल में न मिले, मगर किसी के कहे गये व लिखे गये शब्द भी किसी पुरस्कार से कम नही हैं। किसी प्रतिभा का मरणोपरांत सम्मान करना तो इस देश की परम्परा रही है, लेकिन जीते जी दो मीठे बोल बोलना व उसकी सराहना में कहने में शर्म आती हैं।



जब आप रचनात्मक मिशन पर सजगता के साथ चलते है तो कही न कही से किसी न किसी रूप में हमें प्रोत्साहन अवश्य ही मिलता है और यही प्रोत्साहन हमें अपनी मंजिल पर ले जाता हैं। इस दुनियां की रीत है किसी के श्रेष्ठ कार्य की सराहना न करना चूंकि सराहना व प्रशंसा करने में हमें शर्म आती है। लेकिन उसी प्रतिभा के परलोक सिधारने के बाद हम उसकी तारीफ के पूल बांध देते है। अरे, कुछ कहना ही है तो मुख पर कहिए । पीठ पीछे तो हर कोई कहता है।‌ आज मीडिया जगत मे आने वाले युवाओं को पत्रकारिता का प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। चूंकि पत्रकारिता एक मिशन है कोई व्यापार नहीं। इतना ही नहीं मिशनरी पत्रकारिता से जुड़े वरिष्ठ पत्रकारों के अनुभवों पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया जाना चाहिए व हर राज्य का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ऐसी स्मारिका का प्रकाशन कर उसका पत्रकारों के मध्य निशुल्क वितरण करे।



इससे बेहतर और क्या बात हो सकती है कि आज से तीन साढे तीन दशक पूर्व पत्रकारों के पास आज जितनी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थी। उनके पास सुविधाओ का नितांत अभाव था फिर भी उन्होंने बखूबी रचनात्मक और मिशनरी पत्रकारिता करके एक नया इतिहास रचा जिस पर हमें गर्व है। नेक कार्य की सराहना को टाला नहीं जा सकता। आप भले ही कुछ समय के लिए उसकी सराहना ना करें, लेकिन आखिर में देर सवेर सत्य सबके सामने आ ही जाता है।

थोड़ा पुण्य कमा लिजिए


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