कविता : ओ रंगरेज़

सराबोर कर नख से शिख तक लबालब किया बाँधव ने l बरजोरी की,रंग लगाया उसने पहली होली, प्रीत रंग जो उसने फेंका मैं तो उसकी होलीl मैं तो उसकी होली! #सत्यवती आचार्य, चंडीगढ़

मैं आई हूँ द्वार तुम्हारे
लेके चुनरिया धानी,
ऐसा प्यारा रंग चढ़ा दे
लगूँ मैं जिसमें रानी l

नैन हमारे पिय के नीले
तुम नीला रंग रंगना,
लट उनके घुँघराले हैं
तुम लटकन वैसी रखना l

चाँद सितारों जैसा है
उनके चेहरे पर तेज़,
तुम चूनर में टाँक सितारे
भर देना रंगरेज़ l

खेलूँगी मैं जी भर होली
छोड़ आऊँगी लाज,
रंगों के पावन उत्सव पर
होगा मेरा राज l

भर पिचकारी खेली होली
ज़बरन मुझसे माधव ने,
सराबोर कर नख से शिख तक
लबालब किया बाँधव ने l

बरजोरी की,रंग लगाया
उसने पहली होली,
प्रीत रंग जो उसने फेंका
मैं तो उसकी होलीl
मैं तो उसकी होली!


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