कविता : ऋतुराज बसंत

बोझिल दिवस हुए ओझल l शिथिल दिवस का हुआ है अंत l फिर आया ऋतुराज बसंत ll स्वर्णिम सूर्य से होती भोर, छाई हरियाली चहुँ ओर l भ्रमर कर रहे गुन-गुन गुंजन, संग चली है उनके खंजन l मदमस्त हुए हैं दिग्दिगंत l फिर आया ऋतुराज बसंत ll #सत्यवती आचार्य चंडीग,ढ़

फिर आया ऋतुराज बसंत,
लेकर हर्ष अपार अनंत l
चटकी कलियाँ खिले प्रसून,
आह्लादित कर,भरा जुनून l
पतझड़ का अब हुआ है अंत l
फिर आया ऋतुराज बसंत ll

आम के तरु पर बौर सजे,
चिड़ियों का संगीत बजे l
कुहू- कुहू बोले कोयल,
बोझिल दिवस हुए ओझल l
शिथिल दिवस का हुआ है अंत l
फिर आया ऋतुराज बसंत ll

स्वर्णिम सूर्य से होती भोर,
छाई हरियाली चहुँ ओर l
भ्रमर कर रहे गुन-गुन गुंजन,
संग चली है उनके खंजन l
मदमस्त हुए हैं दिग्दिगंत l
फिर आया ऋतुराज बसंत ll

समय का पहिया चलता निस- दिन,
सतत निरंतर अविरल हरछिन l
सृष्टि है चलती ग़ज़ब की लय पर,
अद्भुत ताल, मात्रा, तय पर l
शरद,शिशिर तो कभी हेमंत,
फिर आया ऋतुराज बसंत ll


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