मेरे विचार : कहने को बहुत छोटा शब्द है “सुमन”, समझें तात्पर्य…

अरे मेरे भाई, प्रभु की भक्ति में कौन सा धन लगता है जो हम भक्ति करने से मन चुराये। परमात्मा की भक्ति में तो बस मन को ही लगाना है। अतः घूमते फिरते, स्नान करते, झाड़ू-पोछा, बर्तन करते भी आप ईश्वर के नाम का स्मरण कर सकते है बस थोडा समय ही तो देना हैं। हमें इस नश्वर संसार में दूसरों का सहयोगी बनकर जीना हैं। समता का नित रस पीना हैं। दीन दुखियों की सेवा करके जीना हैं। #सुनील कुमार माथुर, जोधपुर (राजस्थान)

कहने को तो यह शब्द बहुत ही छोटा हैं। सुमन यानि सुन्दर मन। यह शब्द पुष्प का ही पर्यावाची शब्द हैं। हम परमात्मा को हर दिन या हर त्यौहार पर पुष्प तो चढा देते है लेकिन अपना यह सुन्दर मन उसके नही चढाते है यह कैसी विडम्बना है। हम परमात्मा से हर रोज कुछ तो कुछ मांगते तो रहते है लेकिन अपना सुन्दर मन उसके चरणों में अर्पित नहीं करते है। जबकि मन हमारा अपना ही हैं जो उस परमात्मा ने ही हमें दिया है फिर भी हम उस परमात्मा की भक्ति मन से नहीं करते हैं तब फिर यह पुष्प चढाने से क्या फायदा। यह औपचारिकता क्यों। यह लोक दिखावा क्यों। जब तक हम अपना यह मन रुपी सुन्दर पुष्प परमात्मा को अर्पित नहीं करेगे तब तक कोई लाभ, पुण्य व फायदा मिलने वाला नहीं है।

जीवन का वरदान – हमारे जीवन के कर्म ही है जीवन का वरदान। अतः जो भी कर्म करें। श्रेष्ठ ही करें। हम खाली हाथ तो इस नश्वर संसार में आते है लेकिन जब वापस जाते हैं तब अपने कर्मों की गठरी अपने साथ ले जाते है और हमारे कर्मों के अनुसार ही हमें स्वर्ग नर्क अर्थात अच्छा बुरा फल मिलता है। जब हमें इतना सुन्दर मानव जीवन मिला है तब कैसा राग ध्देष। अरें भाई, प्रेम स्नेह के साथ रहिए और मन मस्तिष्क में खुली हवा के झौंके आने दीजिए फिर देखिए कैसे मन मयूर जैसे नाच उठता हैं। यह जीवन कब नष्ट हो जाये। कोई भरोसा नहीं। आया है वो जायेगा, क्या राजा रंक फकीर। खुशियों के साथ जीवन व्यतीत कीजिए। जीवन का आनन्द ले। मस्त रहे, स्वस्थ रहें और मुस्कुराते रहे यही जीवन का मूल मंत्र है।

व्यक्ति की पहचान – व्यक्ति की पहचान उसके शान शौकत, धन दौलत, गाडी बंगले से नही होती है अपितु उसकी पहचान उसके कर्मों से ही होती हैं। इसलिए कार्य करने से पहले अपने मन मे उस कार्य के प्रति गहन चिंतन मनन करे। मन ही मन आये विचारों पर मंथन करे और फिर उचित अवसर पर उचित बात कहें। बात ऐसी हो जो सर्वमान्य हो। केवल विरोध के लिए कभी भी विरोध न करे। मतभेद हो सकता है लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए।

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निष्ठा के साथ कार्य करे – जीवन जीने की सार्थकता तभी है जब हम अपनी पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ कार्य करे। जो कार्य समर्पित भाव से, ईमानदारी व निष्ठा के साथ जनहित को ध्यान में रखते हुए किया जाता है वह कभी भी गलत नहीं हो सकता है और न ही उसे पूरा करने में कोई बाधा या अडचन आती हैं।‌ याद रखिए जीवन में श्रम से ही सारी विधियां मिलती हैं। हमारा निस्वार्थ भाव व श्रम ही जीवन की बगिया हैं जो हमारे आत्मविश्वास को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होता हैं। पुष्प की खुशबू तो हवा के साथ उस ओर ही जाती हैं जिस ओर की हवा होती हैं। लेकिन इंसान के श्रेष्ठ कर्मो की खचशबू चारों दिशाओं में स्वत: ही फैल जाती हैं। अतः जीवन में कभी भी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह न मोडे।

सबसे बडा सम्मान – परमात्मा ने हमें यह मानव जीवन प्रभु भक्ति करने के लिए दिया है तब फिर हम इसे दूसरों की आलोचना करके, दूसरों की चापलूसी करके या निंदा करके क्यों बर्बाद कर रहे हैं। अरे, यह जीवन तो अनमोल है जो हर किसी को नहीं मिलता हैं। हमें तो गर्व होना चाहिए कि शायद पूर्व जन्म में हमने कोई श्रेष्ठ कर्म किये थे जिसके फलस्वरूप आज हमें यह मानव जीवन मिला है।

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अरे मेरे भाई, प्रभु की भक्ति में कौन सा धन लगता है जो हम भक्ति करने से मन चुराये। परमात्मा की भक्ति में तो बस मन को ही लगाना है। अतः घूमते फिरते, स्नान करते, झाड़ू-पोछा, बर्तन करते भी आप ईश्वर के नाम का स्मरण कर सकते है बस थोडा समय ही तो देना हैं। हमें इस नश्वर संसार में दूसरों का सहयोगी बनकर जीना हैं। समता का नित रस पीना हैं। दीन दुखियों की सेवा करके जीना हैं। हमारे लिए ऐसा करना ही तो सबसे बडा सम्मान हैं। कोई हमारा सम्मान करे या न करे इसकी कभी भी चिंता नहीं करे। लेकिन आपके कार्यो से आपके मन को प्रसन्नता मिले इससे बडा और क्या सम्मान हो सकता हैं।




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