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देवभूमि में सामूहिक रूप से कृषि कार्य की परंपरा की झलक

हुड़के की थाप पर हुड़किया बौल से होती है धान की रोपाई

देवभूमि में सामूहिक रूप से कृषि कार्य की परंपरा की झलक… धान की रोपाई में धान के छोटे छोटे पौधों का रोपण किया जाता है। देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ो में धान की रोपाई के समय हुड़के की थाप पर महिलाओं द्वारा धान की रोपाई की जाती है।  #भुवन बिष्ट / रानीखेत (उत्तराखंड)

रानीखेत। देवभूमि उत्तराखंड अपनी संस्कृति परंपरा और सभ्यता के लिए विश्वविख्यात है। देवभूमि उत्तराखंड के पहाडों में अनेक परंपराऐं अपनी एकता को प्रदर्शित करती हैं। पहाड़ो में कृषि कार्य की रीढ़ यहाँ की मातृशक्ति हैं और वे सदैव आपसी एकता से कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से कर लेती हैं चाहे कृषि कार्य हो अथवा दूर जंगलों से चारा घास लाना हो सभी कार्य मिलजुलकर देवभूमि की महिलाऐं करती हैं।

देवभूमि उत्तराखंड के गाँवों में आज भी कृषि कार्य में विशुद्ध रूप से मानवीय शक्तियों का उपयोग किया जाता है। मिलजुलकर कार्य करने की परंपरा में पल्ट अथवा पौल्ट परंपरा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आजकल भले ही गांवों में पलायन ने पाँव पसारे हों किन्तु आज भी अनेक क्षेत्रों में कृषि भूमि से अच्छी खासी उपज पैदा की जाती है चाहे वह दलहनी फसलें हों या गेहूँ, मडूवा या धान हो। हर फसल को बोने की विधियां भी अलग अलग होती हैं।

भीषण गर्मी के बाद जैसे ही मानसून का आगमन होता है तो पहाड़ो में भी महिलाओं द्वारा कृषि कार्य सामूहिक रूप से प्रारम्भ होने लगता है। मानसून के आगमन के साथ ही देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि कार्य जोर पकड़ने लग जाता है। वैसे अनेक क्षेत्र अपने सब्जी उत्पादन के लिए तो अनेक फलोत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में इन दिनों धान की रोपाई के साथ ही मडुवा की गुड़ाई का कार्य भी जोरों पर चल रहा है। सिंचित कृषि भूमि वाले क्षेत्रों धान की रोपाई का कार्य किया जाता है।

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इसके साथ साथ ही खरीफ की फसल में बोई जाने वाली कई प्रकार की दालें भी बोई जाती हैं जिनमें काले भट, सोयाबीन, राजमा, गहत, रैंस आदि प्रमुख हैं। आजकल देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ो में चारों ओर पहाड़ो व खेत खलिहानों में हरियाली देखने को मिलती है। महिलाऐं कृषि कार्य में जुट जाती हैं सामूहिक रूप से कार्य करने की परंपरा पल्ट पौल्ट परंपरा को आज भी बखूबी निभाया जाता है यह परंपरा हर गाँव में जीवंत रूप में देखने को मिलती है।

देवभूमि उत्तराखंड के पहाडों में अनेक परंपराऐं अपनी एकता को प्रदर्शित करती हैं। पहाड़ो में कृषि कार्य की रीढ़ यहाँ की मातृशक्ति हैं और वे सदैव आपसी एकता से कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से कर लेती हैं चाहे कृषि कार्य हो अथवा दूर जंगलों से चारा घास लाना हो सभी कार्य मिलजुलकर देवभूमि की महिलाऐं करती हैं। देवभूमि उत्तराखंड के गाँवों में आज भी कृषि कार्य में विशुद्ध रूप से मानवीय शक्तियों का उपयोग किया जाता है। मिलजुलकर कार्य करने की परंपरा में पल्ट अथवा पौल्ट परंपरा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

कहीं कहीं मडूवे की गुड़ाई चल रही है,तो वहीं सिंचित कृषि भूमि वाले क्षेत्रों में धान की रोपाई का कार्य चल रहा है। इस कठिन कार्य को सरलता और मनोरंजन के साथ संपन्न करने की जो एक पंरपरा विद्यमान है वह हुड़का बौल परंपरा धान रोपाई में काफी लोकप्रिय रहा है। धान की रोपाई तो अनेक स्थानों पर होती है किन्तु यह परंपरा सीमित क्षेत्रों में ही देखने को मिलती है।देवभूमि के पहाड़ो में चाहे मडूवे की गुड़ाई हो अथवा धान की रोपाई या खेतों में खाद गोबर सराई, घास लाना हो इन सभी में पौल्ट पल्ट परंपरा की एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है यह सामूहिक रूप से कार्य करना भी कहा जाता है।

आजकल आधुनिकता की चकाचौंध में बढ़ते गाँवों से पलायन में धान की रोपाई हुड़किया बौल विलुप्त की ओर है किन्तु आज भी अनेक क्षेत्र इसके विपरीत धान की बहुत अच्छी उपज पैदा करने के लिए जाने जाते हैं। रानीखेत के आसपास गगास घाटी, बिन्ता, बासुलीसेरा क्षेत्र, चौखुटीया,गरूड़,सोमेश्वर सहित अनेक क्षेत्रों में धान की रोपाई की जाती है और ये क्षेत्र धान की अच्छी खासी पैदावार के लिए जाने जाते हैं। महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से धान की रोपाई की जाती है यह एक कठिन कार्य अवश्य है किन्तु देवभूमि की मातृशक्ति के साहस हौंसलों से सभी कठिन कार्य आसानी से संपन्न हो जाते हैं।

आधुनिकता में हुड़किया बौल विलुप्त की ओर है किन्तु अनेक स्थानों पर आज भी यह परंपरा देखने को मिलती है। देखा जाय तो बौल का अर्थ है कार्य और हुड़किया का अर्थ है पारंपरिक लोक वाद्य यंत्र हुड़का। हुड़किया बौल एक प्रसिद्ध गीत भी रहा है। हुड़किया बौल शब्द हुड़का व बौल शब्द से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है कई हाथों द्वारा सामूहिक रूप से कार्य करना। धान की रोपाई के लिए सबसे पहले खेत को तैयार कर लिया जाता है और उसमें पानी छोड़ा जाता है।

धान की रोपाई में धान के छोटे छोटे पौधों का रोपण किया जाता है। देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ो में धान की रोपाई के समय हुड़के की थाप पर महिलाओं द्वारा धान की रोपाई की जाती है। सबसे पहले भूमि के देवता भूमियां व जल के देवता इंद्र छाया प्रदान करने वाले देव मेघ बादलों की वंदना हुड़के की धुन पर गायी जाती है। फिर अनेक पौराणिक गाथाएं भी गाई जाती हैं। पारंपरिक लोक वाद्य हुड़के को थाप देता मुख्य हुड़का वादक गीत गाता है और धान की रोपाई करती महिलाएं उसे दोहराती हैं।

इसमें धान के पौधों को धुन में एक क्रम में रोपा जाता है और हाथों का हुड़के की थाप से मिलान होता है और सुंदर ढंग से धान की रोपाई की जाती है। वास्तव में देखा जाय तो हुड़के की थाप हुड़के की धुन व गीत इस कठिन कार्य को करने में साहस उमंग दिलाने व आसान बनाने का प्रयास व एक सुंदर परंपरा है। इस कठिन कार्य को हुड़के की थाप व मनोरंजक रूप से आसानी से महिलाओं द्वारा संपन्न किया जाता है। विशुद्ध रूप से मानवीय श्रम मानवीय शक्तियों का उपयोग इस कृषि कार्य में किया जाता है। देवभूमि की हर परंपरा मानव को कर्मवीर बनाने की प्रेरणा भी प्रदान करती हैं।


देवभूमि में सामूहिक रूप से कृषि कार्य की परंपरा की झलक... धान की रोपाई में धान के छोटे छोटे पौधों का रोपण किया जाता है। देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ो में धान की रोपाई के समय हुड़के की थाप पर महिलाओं द्वारा धान की रोपाई की जाती है।  #भुवन बिष्ट / रानीखेत (उत्तराखंड)

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