युवा वर्ग में बढती हिंसक प्रवृत्ति और सहनशीलता का अभाव | Devbhoomi Samachar

युवा वर्ग में बढती हिंसक प्रवृत्ति और सहनशीलता का अभाव

अगर कोई उन्हें गुमराह करने का प्रयास भी करें तो वे उनसे दूर रहें । चूंकि जीवन को गलत राह में ले जाकर अपना भविष्य बर्बाद न करें। परमात्मा ने हमें यह मानव जीवन दिया हैं तो फिर आराम से हंसते-हंसते जीवन व्यतीत करें। अच्छे दोस्त बनाये और हंसते मुस्कुराते रहे। #सुनील कुमार माथुर, जोधपुर (राजस्थान)

विश्व में हिंसा रोकने के लिए जितने भी प्रयास किये जा रहे हैं वे सब नकारा ही साबित हो रहे हैं। न जाने शांति कहां गायब हो गई है। आज की युवाशक्ति के हाथों में पाठ्यक्रमों की पुस्तकें होनी चाहिए। उन्हीं युवाओं के हाथ में आज चाकू व बन्दूकें नजर आ रही हैं और वे हर वक्तआज आक्रामक रुख में ही नजर आ रहें हैं। न जाने युवाओं को क्या होता जा रहा हैं। हिंसक प्रवृत्ति को रोकने के लिए युवा पीढ़ी व किशोर वर्ग को आदर्श संस्कार फिर से देने की नितांत आवश्यकता है।

आदर्श संस्कारों के अभाव में वे अच्छे बुरे की पहचान नहीं कर पा रहे है। नतीजन वे तत्काल हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।
अतः शिक्षा के साथ ही साथ बच्चों को नैतिक मूल्यों का ज्ञान कराया जाये, तथा धैर्य, सहनशीलता, परोपकार, दया, करूणा, त्याग, शांति, अहिंसा जैसे गुणों से अवगत कराते हुए उनके लाभों को बतलाया जाये तभी किशोर व युवा वर्ग को हिंसक प्रवृत्ति से रोका जा सकता है। युवाओं को चाहिए कि वे सभी के साथ सौहार्द बनाए रखे व अपने मित्रों के साथ रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहे।

अगर कोई उन्हें गुमराह करने का प्रयास भी करें तो वे उनसे दूर रहें । चूंकि जीवन को गलत राह में ले जाकर अपना भविष्य बर्बाद न करें। परमात्मा ने हमें यह मानव जीवन दिया हैं तो फिर आराम से हंसते-हंसते जीवन व्यतीत करें। अच्छे दोस्त बनाये और हंसते मुस्कुराते रहे। हां आज के समय मित्रता मात्र स्वार्थ पर आकर टिक गई है लेकिन मित्रता का संबंध एक ऐसा संबंध हैं जिससे बडा न तो कोई संबंध हैं और ना ही होगा। चूंकि मित्र ही एक ऐसा व्यक्ति है जिसको हम अपने जीवन के हर पल पल की बात शेयर कर देते है, क्योंकि अपनों से भी अधिक हमें उस पर भरोसा होता हैं।

अतः मित्र को भी चाहिए कि वह कभी भी अपने दोस्त का भरोसा ना तोडे। व्यक्ति ईमानदारी, धैर्य, सहनशीलता, परोपकार, निष्ठा के साथ अपना जीवन यापन करे। ईश्वर की भक्ति करे। ईश्वर की भक्ति व धर्म ग्रंथों के सुनने मात्र से ही हमारा कल्याण हो जाता हैं तो फिर यह हिंसा का तांडव क्यों । हमारे संत महात्माओं का कहना है कि दोस्ती हो तो कृष्ण सुदामा जैसी। कलयुग में तो धर्म कथा सुनने मात्र से भगवान अति प्रसन्न होते हैं और श्रवण करने वालों को अति फल देते हैं। जिसने खुद को परमात्मा को सौंप दिया फिर उसकी रक्षा भगवान ही करते हैं। इसलिए अपने जीवन को सच्चें संतों की सेवा, साधना व तपस्या में अर्पित कर दीजिए।

हिंसा से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है अपितु इससे विनाश ही होता हैं। जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त करना हमारे हाथ की बात नहीं है लेकिन इनके बीच के समय को तो हम प्रेम स्नेह और विश्वास के साथ रहकर आराम से हंसते-हंसते निकाल सकते हैं फिर यह राग ध्देष, विरोध, हिंसा, खून खराबा, मारपीट क्यों। अतः हिंसा से दूर रहे व शांति के साथ जीवन व्यतीत करें। सदैव मस्त रहें और मुस्कुराते रहे। यही जीवन का सच्चा सुख हैं।


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