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हिंदी सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि हमारी संस्कृति भी है…

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

हिंदी सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि हमारी संस्कृति भी है। दुनिया के 150 देशों में हिंदी भाषियों की मौजूदगी से स्पष्ट होजा है कि हिंदी कितनी लोकप्रिय और समृद्धशाली भाषा है। हिंदी बोलने में शर्म नहीं बल्कि हमें फक्र का एहसास होना चाहिए। कभी शर्माएं नहीं, गर्व से कहिए हिंदी हैं हम।

हिंदी के नाम से लोग भारत को याद रखते है। सवाल से भरे लोगो ने देश मे हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार का तरीका ढूंढ ही लिया। 14 सितंबर को हर साल देश मे हिंदी दिवस, हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और विकास के लिए मनाया जाने लगा। हर पहलू से समाज जब हिंदी भाषा को देखता है तो गौरव से उसका शीश उठ जाता है। स्वतंत्र देश 1949 में अपनी स्वतंत्र भाषा की तलाश में हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की कोशिश में लगा था। काफी विचार विमर्श के बाद, हमारे संविधान के भाग 17, अनुच्छेद 343(1) में लिखा गया कि “संघ की राष्ट्रभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।”

भारत के अधिकांशतः क्षेत्रों में हिन्दी भाषा बोली जाती थी इसलिए हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का निर्णय लिया गया। हिन्दी को प्रत्येक क्षेत्र में प्रचारित और प्रसारित करने के लिये 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिंदी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। आपको जानना चाहिए कि अनुसार अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद बोली जाने वाली हिन्दी भाषा पूरे दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी भाषा बनकर हमारा गौरव बढ़ाती है। हमने अपनी भाषा और संस्कृति पर नाज है।

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हर पीढ़ी सम्मान करें

समाज की, देश की, हर पीढ़ी इसका सम्मान करें इसके लिए बच्चों को निजी जीवन मे हिंदी भाषा का सही प्रकार से उपयोग करने की सलाह दी जाती है। हर क्षेत्र में हिंदी को कैसे बढ़ाया जा सकता है इस पर महत्वपूर्ण सुझाव आज के दिन दिए जाते है। त्योहार की तरह हिंदी दिवस को सब एक दूसरे को शुभकामनाएं और बधाईयां देते है। हमारे देश की भाषा को हमारे देशवासी ही सम्मान नही दे रहे। हिंदी में उच्चारित और उपयोग किये जाने वाले सारे शब्द की जगह आज अंग्रेज़ी लेती जा रही है। 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में महात्मा गांधी ने पहली बार हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने की बात की थी। हिंदी के प्रति लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए हिंदी दिवस पर भाषा सम्मान शुरू किया गया। यह सम्मान देश के ऐसे व्यक्ति को दिया जाता है, जिन्होने लोगों के बीच हिंदी भाषा के उपयोग और उत्थान के विषय में योगदान दिया हो।

दुनिया की प्राचीन भाषा है हिंदी

हिंदी भाषा दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा है। दुनिया में सर्व प्रथम संस्कृत भाषा का निर्माण हुआ उसके बहुत जल्द देवनागरी लिपि जो आज हिंदी के नाम से जानी जाती है उसका अस्तित्व आया। हिंदी संस्कृत भाषा का सरल अनुवाद है। संस्कृत को सरल करने के लिए हिंदी का जन्म हुआ है। हिंदी के बाद भारत वर्ष में तमिल, तेलगु, कन्नड़, गुजरती, उर्दू तथा कई अन्य भाषा अस्तित्व में आयी। सम्पूर्ण दुनिया पहले सिर्फ भारत थी आज सहस्त देशों में बंट चुकी है। आज के आधुनिक संसार में ऐसा कोई देश नहीं जहां हिंदी न बोली जाती हो क्योंकि हर जगह का अस्तित्व भारत से हुआ है और हिंदी भारत की धरोहर है।

संस्कृत से हिंदी शब्द का हुआ जन्म

हिंदी शब्द का जन्म संस्कृत भाषा के सिन्धु शब्द से हुआ है। सिन्धु एक नदी का नाम है जो की भारत वर्ष की प्रमुख और प्राचीन नदियों में से एक है। बाहरी महाद्वीप के लोग इस नदी को उदाहरण के रूप में “जिस देश में ये नदी है” वहां के लोगों को सिंधु न कह के हिन्दू पुकारने लगे क्यों की उनके तलाफुज़ में स शब्द निकलना बहुत कठिन होता था, जिस वजह से स की जगह ह लगा कर सिंधु को हिन्दू कहने लगे।

हिंदी की गरिमा जिस कदर होनी चाहिए उसमें हमने कुछ कोताही बरतनी शुरु कर दी है और अंग्रेजी के आगे अपनी भाषा को लोग दरकिनार कर रहे हैं जो न्यायोचित नहीं है। मैं ये नहीं कहता कि किसी भाषा को सीखना गलत है, बल्कि हमारा मानना है कि हिंदी के साथ-साथ अन्य भाषा जिसकी आवश्यकता है सीखनी चाहिए। हिंदी भले ही आज लोग सिर्फ भाषा समझते हों मगर इतना तो सभी को जानना चाहिए की यह हमारी संस्कृति भी है। इसके एक-एक शब्द सारगर्भित होते हैं।

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