मानवतावादी कवि : श्री मुकेश कुमार ऋषि वर्मा | Devbhoomi Samachar

मानवतावादी कवि : श्री मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

भारत को हम विश्व गुरु के रूप में मान्य करते हैं, भारत विश्व का सबसे बड़ा शक्तिशाली राष्ट्र है। लेकिन भारत में जो ज्वलंत समस्या है बेरोजगारी, बढ़ती हुई जनसंख्या, आतंकवाद, भ्रष्टाचार आदि। यह जो समस्याएं हैं इनमें सबसे अपने ही देश के लिए धोखाधायक समस्या भ्रष्टाचार की है। भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिससे अपने ही लोग अपने ही लोगों को लूट रहे हैं। #डॉ सुनील कुमार परीट, बेलगांव (कर्नाटक)

साहित्य की सार्थकता उसके मूल्य पर निर्भर होता है। साहित्य सदैव मूल्यवान होना चाहिए, साहित्य में निहित सामाजिक, नैतिक, राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक तत्वों पर सृजित होना ही मूल उद्देश्य है। साहित्य समाज का दर्पण होता है और यह तत्व किसी भी युग के साहित्य को प्रभावित करता है। साहित्य चाहे प्राचीन काल का हो आधुनिक साहित्य हो मनुष्य की भावनाएं, हर्ष, उल्लास, क्रोध, द्वेष आदि सभी गुणों का मूल्यांकन करता है। परंतु खरा साहित्य वही उतरता है जिसमें मानवीय मूल्य हो, समाज के हित में हो, राष्ट्र के हित में हो। जो पाठक साहित्य की किसी भी विधा को पढ़ते हैं तो उसे वह साहित्य अपनी जिंदगी का एहसास करना चाहिए।

जब तक साहित्य अपना नहीं लगता तब तक वह साहित्य सार्थक नहीं होता। आज हम इस संदर्भ में श्री मुकेश कुमार ऋषि वर्मा की कुछ कविताओं पर चर्चा कर रहे हैं क्योंकि ये कविताएं हमें अपनेपन की महसूस कराती है। उनकी एक कविताएं मानवतावादी कविताएं हैं, हर एक पाठक के हृदय को स्पर्श करती है। संसार में सच्चा सुख कहां है सामान्य आदमी से लेकर साधु संत भी इस खोज में रहते हैं। जो व्यक्ति दूसरों को सुख देकर जीता है वही सच्चा सुखी होता है। परोपकार में जो सुख है वह किसी अन्य चीज में नहीं है। दूसरों का दुख बांट लेना, उनके कष्ट में उनके साथ रहना वास्तव में यही एक सात्विक जीवन है। इसलिए श्री मुकेश कुमार ऋषिवर्मा जी अपनी कविता में कहते हैं –

“मैं नहीं चाहता कोई बरबाद हो?
मैं हमेशा से ही आबाद का समर्थक रहा हूं
तो भला कैसे किसी को गिरा सकता हूं?
मैं आस्तीन में छुपा कोई सांप नहीं।
मैं हूं एक खुली किताब
मेरे अंदर समाया है
जमाने भर का दर्द।‘’

गांव में जो सुख समाधान मिलता है वह शहर में नगरों में कभी नहीं मिल सकता। पर आजकल शहरों ने गांवों तक अपने बाहुओं को फैलाया है। स्वर्ग से दिखने वाले गांव आज शहर में तब्दील हो रहे हैं। यह जो परिवर्तन आ रहा है इसे विकास के नाम से पहचाना जाता है, पर दूसरी ओर यह आम जिंदगी के साथ खिलवाड़ है। गांव में जो शुद्ध हवा बहती है, शुद्ध पानी मिलता है, सौंधी मिट्टी की खुशबू महकती है, गांव में जो कोयल गाती हैं यह सब शहरों में कहां मिलता है? इसी विडंबना को कवि अपने शब्दों में व्यक्त करते हैं –

“कभी बड़ा खूबसूरत था मेरा गांव
मिलती थी बरगद वाली ठंडी छांव।
शहरों ने सीमा जब से तोड़ी
गांव की पगडंडिया हुई चौड़ी।
कभी बड़ा खूबसूरत था मेरा गांव
अब पहले जैसा नहीं रहा मेरा गांव।‘’

भारत को हम विश्व गुरु के रूप में मान्य करते हैं, भारत विश्व का सबसे बड़ा शक्तिशाली राष्ट्र है। लेकिन भारत में जो ज्वलंत समस्या है बेरोजगारी, बढ़ती हुई जनसंख्या, आतंकवाद, भ्रष्टाचार आदि। यह जो समस्याएं हैं इनमें सबसे अपने ही देश के लिए धोखाधायक समस्या भ्रष्टाचार की है। भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जिससे अपने ही लोग अपने ही लोगों को लूट रहे हैं। जिससे देश की प्रगति तो नहीं होगी सिर्फ एक व्यक्ति की प्रगति हो सकती है वह भ्रष्टाचारी अपनी प्रगति कर सकता है। आज राष्ट्र सर्वोपरि की बातें होती है वहीं पर ऐसे भ्रष्टाचारी अपना परचम लहरा रहे हैं। इसीलिए कवि अपना दुख खुले आम व्यक्त कर रहे हैं –



“भ्रष्टाचार बन गया शिष्टाचार
भुखमरी-गरीबी का गरम बाजार।
जनतंत्र बन गया आज मजाक
संसद में जा बैठे चोर हजार।
हे सुभाष भगत बिस्मिल अशफाक
कब होगा भारत भू पर सच्चा उजियार।
भ्रष्टाचार बन गया अब तो शिष्टाचार
आम आदमी जाए कहां किस द्वारा।‘’



इस ब्रह्मांड का सृष्टिकर्ता एक है, देव एक नाम अनेक, जाति धर्म अनेक इंसान एक, लहू का रंग एक। ऐसी बड़ी-बड़ी बातें खाने में एवं सुनने में बहुत अच्छी लगती है। परंतु वास्तव में इस पवित्र धरा पर ऐसा कुछ होता ही नहीं है और कोई मानता भी नहीं है। जाति धर्म के नाम पर, मजहब के नाम पर, यहां तक की भगवान के नाम पर भी यहां पर आतंक फैलाया जाता है खून खराब होता है। इंसानियत की किसी को कुछ भी यहां पर लेना देना नहीं है, हम लोग जाति धर्म के पीछे पड़े हुए हैं, स्वजन हित में लिपटे हुए हैं। ऐसी भावना हमें भरी हुई है तो हमें भगवान का दर्शन कैसे होगा। इंसानों में हम इंसानियत नहीं रखते हैं तो इंसान कैसे कहलाएंगे? इस धरातल पर यह जो नौटंकी होती है इसे रोकना होगा वरना बहुत देर हो जाएगी कोई नहीं बच पाएगा। इस संदर्भ में कवि की हे प्रभु कविता के पंक्तियां बहुत ही यथोचित लगती है –



“जल थल नभ सर्वत्र वास प्रभु तेरा
कोटि-कोटि नमन स्वीकार करो मेरा।
ईश्वर अल्लाह गॉड गुरु तेरे रूप अनेक
इंसानों की आंखों का धोखा, ईश्वर एक।
धरती के इंसानों ने नाम बनाया, रूप बनाया
प्रभु तुझे बांटकर मंदिर मस्जिद में बैठाया।
हे प्रभु दे दो सतबुद्धि लटके इंसानों को।।‘’



वहीं दूसरी ओर कवि कहते हैं कि यह हमारा इंसान कब होश में आएगा क्योंकि असल में कोई जाति धर्म या कोई हिंदू मुस्लिम खतरे में होता नहीं है। जिस देश में नारी की पूजा होनी चाहिए थी वहीं पर आज इस नारी पर दिनदहाड़े अत्याचार होते हैं खुले आम उसे बदनाम किया जाता है।

“न हिंदू खतरे में है
न मुसलमान
न सिख इसाई
खतरे में तो मेरे देश की बेटियां हैं।
जो आए दिन
बनती है शिकार
हैवानों की शैतानों की।‘’



एक परिवार के प्रति पिता की जिम्मेदारी बहुत ही अहम होती है। एक पिता अपने बच्चों के लिए सारा संसार होता है, एक पिता परिवार के सपनों का साकार होता है। एक पिता अपने परिवार के लिए अपनी सारी उम्र लगाकर परिवार की रक्षा करता है परिवार के सदस्यों का पालन पोषण करता है। एक पिता परिवार के सभी सदस्यों के लिए सर्वस्व होता है। आदरणीय कवि मित्र श्री मुकेश कुमार ऋषिवर्मा जी पिता के बारे में लिखते हैं –

“पिता परिवार की प्राणवायु है
पिता परिवार के प्रत्येक सदस्य की आयु है।
पिता का प्रेम सदा अदृश्य ही रहता है
पिता हंसते-हंसते कड़वा जहर पीता है।
पिता से बड़ा नहीं कोई भगवान
पिता परिवार की अमिट पहचान।‘’



जैसी चाह वैसी राह के अनुसार जीवन को कैसे बनाना है वह हमारे हाथ में होता है जैसी हमारी दृष्टि होती है वैसी सृष्टि हमें दिखती है। जीवन का भी वैसा ही है अगर जीवन को हम गमों का सागर मान लेंगे तो वैसा ही हमें महसूस होगा, अगर जीवन को हम सुंदर मधुबन मानेंगे तो सुंदर स्वर्ग सा लगने लगता है। हमारा जीवन परोपकारी हो, हमारा जीवन इस पवित्र मातृभूमि के लिए हो, हमारा जीवन सर्वहित के लिए हो तभी हमारा जीवन सार्थक बन पाएगा। परम मित्र श्री मुकेश कुमार ऋषिवर्मा जी जीवन के बारे में लिखते हैं –

“वसुंधरा को नेक कर्मों से स्वर्ग बनाओ।
राष्ट्रहित तन-मन-धन अर्पण कर जाओ।।
अच्छे कर्मों से जग बगिया महाकावे।
निर्भय हो जीवन सुखमय जीते जाओ।।‘’



कुल मिलाकर हम यह स्पष्ट कह सकते हैं कि श्री मुकेश कुमार ऋषि वर्मा जी की कविताएं मानव जीवन के हित में है, समाज के हित में है, राष्ट्र के हित में है। इसलिए उनकी हर एक कविताएं मानव मन को भा जाती हैं, पाठक को सोचने को विवश करती है। ऐसी ही उनकी कविताएं, उनका साहित्य समाज का मार्गदर्शन करें और हम जैसे पाठकों को सहज उपलब्ध हो।


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