जनगणना : पारदर्शिता कहां है, क्या सरकारें शून्य हो चुकी है…!

मौजूदा स्थिति और भी भयावह है ऐसे में जाति आधारित जनगणना सार्वजनिक कर पार्टीयां किसी वर्ग विशेष पर गाली गलौज और सियासत की रोटीयां खूब सेक रही है जिससे सामाजिक कटुता भी बढ रही है, इसलिए सभी सरकारे ऐसे मसले को भुलाये रखना ही जरूरी समझती है। देश के सभी राज्यो मे क्षेत्रीय पार्टीयों की भरमार है जो किसी न किसी जाति विशेष का नेतृत्व करती है। #आशुतोष, पटना बिहार

जनगणना अर्थात आबादी की गिनती वो तो सभी सरकारें करती आ रही है और होनी भी चाहिए, लेकिन विगत कुछ वर्षो से एक नई वहस छिड़ी है वो है जातिगत जनगणना। क्षेत्रीय पार्टीयों का बढ़ता दबाब ऐसे मुद्दे को सार्वजनिक कर आखिर क्या साबित करना चाहता है? जबकि आज ऐसे परिवार को सरकारी लाभ दिये जाते है जो पहले से संपन्न है। बिहार में जातिवाद चरम पर है और इस जनगणना ने इसे और हवा दे दी है जबकि राजनीतिक पार्टीयां अपने मतलब के आंकडे प्रकाशित कर सभी आंकडे चबा गयी, ऐसा विभिन्न समुदायों द्वारा अलग अलग मंचो से आक्रोश व्यक्त कर सुर्खियां बटोर रही है.

जबकि वास्तविकता कुछ और है।तो फिर क्यूं नही लगे हाथ बिहार सरकार पुनःएकबार आरक्षण लाभार्थी की भी गणना करती जो परिवार एक बार किसी तरह का आरक्षण का लाभ ले चुका उसे बाहर किया जाना चाहिए और उसके भी आंकड़े प्रकाशित होनी चाहिए। आखिर पारदर्शिता कहां है क्या सरकारें शून्य हो चुकी है। जिस बाबा साहब के संविधान की दुहाई देते है जात पात लिंग भेद की पक्षपात नही करने की शपथ लेते है वे जातिवादी का दंश फैलाकर वोट बैंक की राजनीति कैसे कर सकते है क्या उनकी जमीर मर चुकी?

आज तक 1931 के बाद जाति आधारित जनगणना सार्वजानिक नहीं हुई आंकडे तो होते है पर वह सार्वजनिक नहीं होती शायद यही उन छोटे छोटे दलो को कुंठित कर रही थी।जातिगत पार्टीयां ही ऐसे मांगो को लेकर ज्यादा उत्साहित होती रही है,जबकि नेशनल पार्टीयां ऐसे मुद्दों से परहेज करती रही हैं। इसी को समझकर 1941 में जातिगत जनगणना की गयी लेकिन आंकडे सार्वजनिक नही हुए 2011 में भी सामाजिक आर्थिक और जातिगत जनगणना हुई लेकिन आंकडे सार्वजनिक नही हुए। सियासत के लिए जातिगत आंकडा जरूरी होता है 1931 से प्राप्त आंकडे के आधार पर आज भी सियासत होती है।

मौजूदा स्थिति और भी भयावह है ऐसे में जाति आधारित जनगणना सार्वजनिक कर पार्टीयां किसी वर्ग विशेष पर गाली गलौज और सियासत की रोटीयां खूब सेक रही है जिससे सामाजिक कटुता भी बढ रही है, इसलिए सभी सरकारे ऐसे मसले को भुलाये रखना ही जरूरी समझती है। देश के सभी राज्यो मे क्षेत्रीय पार्टीयों की भरमार है जो किसी न किसी जाति विशेष का नेतृत्व करती है। उनके लिए यह आंकडा तुरुप का इक्का सावित हो सकता है शायद यही सोचकर क्षेत्रीय पार्टीयां केन्द्र सरकार पर दबाव बनाती रही है। दरअसल यह पार्टी नही एक वर्ग-विशेष का नेतृत्व है जो कि सिर्फ अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने से मतलब रखती है।

जबकि इनकी मांग यह होना चाहिए था कि सरकार को आर्थिक कमजोर के आंकडे सार्वजनिक कर उनको सभी सरकारी योजनाओ का लाभ मिले इस पर ध्यान देने के लिए रास्ते बताते। देश की एक बड़ी आबादी आज तंगहाल है उनकी आर्थिक हालत खराब है ऐसे में जातिगत आंकडे का औचित्य क्या?शायद ऐसे जातिगत पार्टीयां ही फूट डालो और राज करो की नींव रखती है। एक पढा लिखा नौजवान आज के परिवेश में जाति से मतलब कतई नही रखता लेकिन प्रदेश के नामी गिरामी लीडर, मुखिया उप-मुखिया जाति विशेष की मांग करता है, ऐसे प्रदेश का उत्थान कैसे, संभव है।


जाति एक सामाजिक विध्वंस का हथियार है जिससे राजनीति को दूर किया जाना चाहिए। जबतक जातिगत मानसिकता होगी सामाजिक और आर्थिक पतन होता रहेगा। इसलिए सरकारों को गंभीरतापूर्वक विचार कर राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक आधारित एवं आरक्षण लाभार्थी के आंकडे सार्वजनिक करनी चाहिए।ताकि वंचित लोगो तक सरकारी लाभ और अधिक पहुँच सके। सरकारी योजनाएं गरीबो के लिए बनायी जाती रही है फिर भी आज तक गरीबी है यह बात हजम नही होती आखिर क्यों?


क्योंकि जिनको योजनाओं का लाभ मिलना चाहिए उनको न मिलकर उससे पहले उन ताकतवर लोगो में बंदरबांट हो जाता है।आरक्षण उसे दिया जाना चाहिए जो उसकी परिधी मे है ? आरक्षित टिकिट उसे दे दी जाती है जो पहले से सांसद रह चुका है आखिर इन सबका आंकलन क्यों नही होता।जब संविधान की शपथ लेकर लिंग जात पात संप्रदाय से भेदभाव नही करूंगा की शपथ लेकर ऐसी भेद भाव की राजनीति देश और लोगो के साथ खिलवाड़ है।


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