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विश्व प्रकृति दिवस : प्रकृति और पर्यावरण एक दूसरे के पूरक

ओम प्रकाश उनियाल

जल, जंगल और जमीन ही तो प्रकृति की शान हैं, प्रकृति का आधार हैं । आज ये तीनों ही घटते जा रहे हैं। जिसके कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। दुनिया के अधिकतर देशों में इन तीनों तत्वों का क्षेत्रफल दिनोंदिन घटता जा रहा है। जिसके कारण कई वनस्पतियां और जीव-जंतु विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्ति के कगार पर हैं। प्रकृति पर सबकुछ निर्भर है। जिन देशों में जल, जंगल और जमीन का संरक्षण किया जा रहा है वहां प्रकृति अपना खजाना पूरी तरह खोले हुए रहती है।

प्रकृति को मनुष्य नहीं समझ पा रहा है। बरबस उससे छेड़छाड़ करता रहता है। जिसके फलस्वरूप भयंकर से भयंकर तबाही का मंजर देख चुका है। मनुष्य ने प्रकृति को बहुत ही हल्के में लेने की अपनी आदत बना डाली है। प्रकृति के बिगड़ते संतुलन के कारण दुनिया की रचना जिस तरह से हुई थी उसका आकार तक बदलता जा रहा है।

प्राकृतिक संपदा का बेहिसाब दोहन, निरंतर बढ़ती जनसंख्या, वाहनों का जहर उगलता धुंआ, औद्योगिक ईकाईयों से निकलने वाला रसायन, अपशिष्ट व जहरीली गैस, विषैली गैसों का उपयोग, खेती में रसायनों की अधिकता, जल-क्षरण जैसे कारकों से प्रकृति काफी प्रभावित हो रही है। जिसका असर पर्यावरण पर भी प़ रहा है।

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प्रकृति व पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। इनमें से किसी की भी कमी मानव से लेकर जीव-जंतुओं व तमाम प्रकार के पेड़-पौधों एवं वनस्पतियों के लिए घातक साबित हो सकती है। विश्व प्रकृति दिवस पर दुनिया के तमाम देशों को प्रकृति को संजोने का संकल्प लेना है। संकल्प ही नहीं अपितु धरातल पर एकजुट होकर काम भी करना है। वरना एक दिन ऐसा आएगा जब पृथ्वी पर जीवन हमेशाके लिए विलुप्तहो जाएगा।

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