लोकपर्व प्रकृति संरक्षण के द्योतक | Devbhoomi Samachar

लोकपर्व प्रकृति संरक्षण के द्योतक

ओम प्रकाश उनियाल

त्यौहार छोटा हो या बड़ा उसको मनाने का मतलब आपस में खुशियां बांटने से होता है। अपनी संस्कृति और लोकपर्व की पहचान बरकरार रखने के लिए जरूरी होता है कि हर त्यौहार को मनाया जाए। ताकि आगे की पीढ़ी लोकपर्व मनाने से वंचित व अनभिज्ञ न रहे। पहाड़ों में ज्यादातर लोकपर्व प्रकृति से संबंधित होते हैं। प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देते हैं ये लोकपर्व।

ऐसा ही एक लोकपर्व फूलदेई उत्तराखंड का प्रसिद्ध त्यौहार है। जो कि प्रकृति से जुड़ा हुआ है। चैत्र माह की शुरुआत भी इसी दिन होती है। फूल संगरांद के नाम से भी जाना जाता है यह त्यौहार। बसंत ऋतु के आगमन पर तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल जब पहाड़ों में जगह-जगह खिले देखने को मिलते हैं तो प्रकृति से जुड़ाव होना स्वाभाविक है।

परंपरागत रूप से मनाया जाने वाले इस त्यौहार के दिन गांवों में बच्चे जंगली फूलों (फ्योंली, बुरांश आदि) को एकत्रित कर लोगों के घरों की देहरी पर रख कर हर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। त्यौहार मनाने के पीछे एक अन्य कहानी भी है लेकिन असल में प्रकृति को बचाने का मूल उद्देश्य है। प्रकृति रहेगी तो जीवन में हर्षोल्लास व उमंग का संचरण भी तभी होगा। दोनों का समन्वय आवश्यक है।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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ओम प्रकाश उनियाल

लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार

Address »
कारगी ग्रांट, देहरादून (उत्तराखण्ड)

Publisher »
देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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