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जो बालिकाएं अपने घर-परिवार व समाज के बीच नरक का जीवन जी रही हैं। इसके लिए समूचा समाज ही दोषी है। केवल अकेले बालिकाओं के जागरूक होने से उनके सशक्त बनने का दावा ठोकना अपने आप को झूठी दिलासा दिलाने के समान है। #ओम प्रकाश उनियाल
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जब देश की कोई भी बालिका किसी भी क्षेत्र में वह मुकाम हासिल करती है जिसके सपने वह संजोए रहती है तो वह हर बालिका के लिए प्रेरणा बन जाती है। घर-परिवार से लेकर बाहर तक सभी गौरवान्वित होते हैं। देश का नाम रोशन होता है। भारत में बालिकाओं को आगे न बढ़ने देने की जो परंपरा चली आ रही है उसमें धीरे-धीरे हल्का-सा परिवर्तन भी देखने को मिल रहा है।
जिन बालिकाओं के अभिभावक यह समझते हैं कि बालिकाओं को उनके अधिकारों से वंचित नहीं रखना चाहिए वे ही आगे बढ़ने के लिए कदम उठाती हैं। राज्य सरकारें व केंद्र सरकारें बालिकाओं के विकास के लिए अनेकों योजनाएं चलाती आ रही हैं। इन योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा जब वे जागरूक होंगी, उनके अभिभावक जागरूक होंगे। बालिकाओं की नींव यदि मजबूत होगी तभी एक स्वस्थ समाज की परिकल्पना साकार होना संभव होगा।
महिला सशक्तिकरण को लेकर काफी कुछ किया जा रहा है। मगर समाज में अभी भी ऐसे तत्व हैं जो महिला सशक्तिकरण के विरोधी हैं। बालिकाओं के साथ ऐसे-ऐसे कुकृत्यों की घटनाएं घटने की खबरें देखने-सुनने व पढ़ने को मिलती हैं जिनसे रूह कांप उठती है। ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले हमारे बीच से ही होते हैं। राष्ट्रीय बालिका दिवस हमारे देश में पिछले 15-16 साल से प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य बालिकाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना है।
यह सत्य है कि परिवर्तन भी हुआ है मगर इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता कि बालिकाओं की स्थिति वर्तमान में चिंताजनक ही है। 24 जनवरी 1966 को स्व.इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी थी। 2008 से राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाना शुरु हुआ था। बालिकाओं को सशक्त बनाने के लिए सरकारें कितनी भी योजनाएं चलाए वे तभी फलीभूत होंगी जब सबसे पहले पूरा समाज जागरूक होगा।
जो बालिकाएं अपने घर-परिवार व समाज के बीच नरक का जीवन जी रही हैं। इसके लिए समूचा समाज ही दोषी है। केवल अकेले बालिकाओं के जागरूक होने से उनके सशक्त बनने का दावा ठोकना अपने आप को झूठी दिलासा दिलाने के समान है।








