सफल जीवन

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सुनील कुमार माथुर

माता-पिता परिवार में ईश्वर के प्रतिनिधि हैं चूंकि ईश्वर हर वक्त हर जगह नहीं रह सकता । अत माता — पिता का मान –सम्मान आप ईश्वर की पूजा अर्चना जिस तरह से श्रध्दा पूर्वक करते हैं उसी तरह से माता पिता का सम्मान कीजिये । बालक जब संकट में होता है तो वह पहलें मां को ही याद करता हैं व जब किसी चीज या वस्तु की जरूरत होती है तो वह पिता के पास जाता हैं । अतः बच्चों को कभी भी जिद नहीं करनी चाहिए । उन्हें माता पिता की हर बात माननी चाहिए चूंकि वे कभी आपकों मारते भी है तो आपकी भलाई के लिए ही वे ऐसा करते हैं । वरना बिना वजह कौन अपनी संतान के साथ मारपीट करता है ।

जैसे ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए हर वक्त तैयार रहते है और जरुरत पडने पर दौडे चले आते हैं उसी प्रकार से माता पिता अपनी संतान की रक्षा के लिए दौडे चले आते हैं । अतः उनका अपमान करना ईश्वर का अपमान करने के बराबर हैं । वे वंदनीय है , पूज्यनीय हैं चूंकि वे न केवल हमारा लालन पालन ही करते हैं अपितु हमें आदर्श संस्कार देकर देश का एक आदर्श नागरिक भी बनाते हैं । यही वजह हैं कि हम उनका ऋण कभी भी नहीं उतार सकते ।

संस्कार कहीं बाजार में नहीं बिकते कि हम जब चाहें तब खरीद लें । वे तो माता पिता ही दे सकते हैं । आदर्श संस्कारों के बिना यह मानव जीवन पशुतुल्य हैं । जीवन जीना भी एक कला हैं और जिसने आदर्श जीवन जीना सीख लिया हैं मानों उसका जीवन सफल हो गया है।

हमारे बडे बुजुर्गो व महापुरुषों का कहना हैं कि हमें जीवन में हमेशा खुश रहना चाहिए । चूंकि परेशान होने से कल की मुश्किल दूर नहीं होती अपितु आज का सुकुन भी चला जाता हैं । सुख व्यक्ति के अंहकार की परीक्षा लेता हैं जबकि दुःख व्यक्ति के धैर्य की । दोनों परीक्षाओं में उतीर्ण व्यक्ति का जीवन ही सफल जीवन हैं । बच्चा जब मां के पेट में होता हैं तभी माता पिता कहते है कि देखों वह बडा हो रहा हैं लेकिन जन्म के बाद से वह हमेंशा मां बाप के लिए बच्चा ही रहता है ।

बच्चों को कोई भी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिसके कारण उन्हें शर्म से किसी के सामने अपना सिर झुकाना पडें अपितु ऐसा कार्य करें कि गर्व से उनका सीना चौडा हो जायें माता पिता की आज्ञा का सदैव पालन करें और उनके आदर्श सपनों को साकार कीजियें । वे आपके दुश्मन नहीं आपितु आपके सच्चे शुभचिंतक है।

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