
यह आलेख आधुनिक जीवन में धन की अंधी दौड़ के बीच परिवार, संवाद और मानवीय रिश्तों के महत्व को उजागर करता है। लेखक ने बढ़ती महंगाई, मोबाइल संस्कृति और बदलती जीवनशैली के कारण रिश्तों में बढ़ती दूरियों तथा जीवन मूल्यों के क्षरण पर चिंता व्यक्त की है।
- रिश्तों से बड़ी कोई दौलत नहीं
- मोबाइल युग में खोता संवाद
- विकास या विनाश की ओर समाज
- परिवार, संवाद और जीवन का सच
सुनील कुमार माथुर
जीवन की असली दौलत परिवार होता है, जो हर सुख-दुःख में बिना शर्त साथ निभाता है, लेकिन आज इंसान धन के पीछे इतना दौड़ रहा है कि उसके पास परिवार को समय देने के लिए भी समय नहीं है। यह कैसी विडम्बना है और कैसी प्रगतिशीलता है, जो परिवार के सदस्यों के बीच में भी दूरियां बढ़ा रहा है। जब हम किसी से कहते हैं कि धन-दौलत के पीछे इतना क्यों दौड़ रहा है, तो वह एक ही जवाब देता है कि लिखने वाले ने तो लिख दिया कि दौलत साथ नहीं जाएगी, लेकिन यह नहीं लिखा कि मरते दम तक बहुत काम आएगी। अब उसे ऐसे में क्या जवाब दें। वह भी अपनी जगह सही है।
असली दौलत परिवार है। इसीलिए तो इंसान उसकी सुरक्षा, खान-पान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रहन-सहन जैसी आवश्यक जरूरतों को पूरा करने में लगा हुआ है। चूंकि महंगाई की मार ने इंसान को नींबू की तरह निचोड़ कर रख दिया है। कौन व्यक्ति आदर्श जीवन व्यतीत नहीं करना चाहता, लेकिन बढ़ती महंगाई और नित नए बढ़ते शौक ने इंसान के जीवन को मशीनरी जीवन बना दिया है। कभी लोग साइकिल पर स्कूल, कॉलेज, बाजार व एक गांव से दूसरे गांव जाया करते थे, लेकिन आज उसका स्थान कारों ने ले लिया है। परिवार में जितने सदस्य हैं, उतनी ही कारें और स्कूटर घर में हैं। नतीजन शहरों में प्रदूषण की समस्या पैदा हो गई। विकास के नाम पर भरे वृक्ष कट गए। विकास के नाम पर हमने ही विनाश को ला खड़ा कर दिया।
आज इंसान से बात करने में भी लोगों को शंका हो रही है। जब से मोबाइल आया है, तब से आपसी बातचीत व संवाद करना ठप-सा हो गया है। बस मोबाइल पर दिन भर फॉरवर्ड का कार्य चलते रहते हैं। एक-दूसरे को वीडियो, कॉमेडी या प्रातःकाल सुप्रभात भेजकर इतिश्री की जा रही है, लेकिन आपस में बातचीत नहीं कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि मोबाइल आने से इंसान मूक-बधिर बन गया है। किसी को अपना समझकर कुछ कह दिया तो सीधा-सा जवाब है कि ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है। लोगों की आदत होती है सामने सलाम व पीछे बदनाम। मोह इतना न करें कि बुराइयां छुप जाएं व घृणा भी इतनी न करें कि अच्छाइयां देख न पाएं।
मनुष्य दूसरों की गलतियां अक्सर जल्दी देख लेता है, लेकिन अपनी गलतियों को देखने के लिए उसे पूरी जिंदगी भी कम पड़ जाती है। कड़वा सच यह है कि दुनिया में लोग आपकी अच्छाई नहीं, बल्कि आपकी कमजोरी याद रखते हैं। इसलिए हर कार्य मन लगाकर करें और पहले से बेहतर करें, ताकि किसी को गलती निकालने का अवसर न मिले।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआं, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान







