
यह आलेख जीवन में संवाद, सामंजस्य और विनम्रता के महत्व को रेखांकित करता है। लेखक ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आपसी समझ, क्रोध से दूरी तथा प्रशंसा और आभार व्यक्त करने की संस्कृति को जीवन को मधुर बनाने वाला बताया है।
- संवाद से बनते हैं रिश्ते
- जीवन को मीठा बनाते कड़वे घूंट
- क्रोध नहीं, सामंजस्य जरूरी
- प्रशंसा और आभार का महत्व
सुनील कुमार माथुर
कहते हैं कि आजाद कर दो उन परिंदों को, जो हर किसी के साथ उड़ने का शौक रखते हैं। अर्थात व्यक्ति को हर किसी के साथ तालमेल बैठाकर चलना चाहिए। चूंकि कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण नहीं होता है, उसे आपसी विचार-विमर्श से ही सहयोग की भावना के साथ कार्य करना पड़ता है। इसलिए युवाओं को चाहिए कि वे बुजुर्गों के जीवन के अनुभवों का लाभ उठाते हुए कार्य करें। वहीं दूसरी ओर बुजुर्गों को भी चाहिए कि वे युवा पीढ़ी के विचारों को सुनें, समझें व जहां आवश्यक हो वहां उचित मार्गदर्शन करें, ताकि युवाओं और बुजुर्गों के बीच सामंजस्य बना रहे। कभी भी युवाओं की उचित बात को अनदेखा न करें। चूंकि संवाद से ही हर समस्या का समाधान होता है। जहां संवाद का अभाव रहता है, वहीं शंकाओं व संदेह का जन्म होता है।
जीवन में कभी भी किसी पर क्रोध न करें व क्रोध से हमेशा दूर रहें, क्योंकि जहां क्रोध व अहंकार का भाव होता है, वहां कभी भी सुख-शांति, प्यार-मोहब्बत नहीं होता है। याद रखिए कि दो पल के गुस्से से प्यार भरा रिश्ता बिखर जाता है और होश जब आता है तो वक्त निकल जाता है। उचित समय पर पिए गए कड़वे घूंट सदैव जीवन मीठा कर दिया करते हैं।
प्रशंसा के शब्दों का पीछा न करें, खुद एक पूर्ण स्वर-लहरी बनें। जब आपकी सफलता श्रेष्ठता का प्रमाण बन जाती है, तब आपके विरोधी भी आपकी सराहना की कतार में खड़े नजर आते हैं। कोई श्रेष्ठ कार्य करे तो उसकी प्रशंसा कीजिए कि आपके श्रेष्ठतम परिश्रम को नमन है। आपकी प्रशंसा के ये दो शब्द ही कार्य करने वाले का हौसला-अफजाई करने में काफी हैं, लेकिन हम इंसान इतने स्वार्थी हैं कि काम हो जाने पर धन्यवाद भी नहीं देते हैं। मात्र अंगूठे का निशान, दिल का निशान भेजकर इतिश्री कर लेते हैं। आभार सदैव बोलकर संवाद करते हुए व्यक्त कीजिए। उसका आनंद ही और है।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच एवं
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआं, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान







