
यह कविता वर्तमान समाज में सत्य की उपेक्षा, झूठ के बढ़ते प्रभाव और नैतिक मूल्यों के पतन को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। कवि ने सत्ता, समाज और बाजार के बीच संघर्ष करते सत्य की पीड़ा तथा जागरूकता की आवश्यकता को प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया है।
- सच की खामोश पुकार
- झूठ के बाजार में सत्य
- मौन होता ईमान
- सत्य की प्रतीक्षा में समाज
डॉ. सत्यवान सौरभ
झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन,
घेरे घोर उदासियाँ, सुनता उसकी कौन॥
मंचों पर सच हारता, झूठ करे अभिनंदन,
सिक्कों के इस खेल में, बिकता हर स्पंदन।
न्याय बिके बाजार में, पूछे अब वह कौन—
झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन॥
चेहरों पर उजली हँसी, भीतर काला शोर,
मीठी वाणी ढाँपती, छल का गहरा छोर।
विश्वासों की राह में, बिखरे काँटे मौन—
झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन॥
सत्ता की चौखट तले, पलते झूठे आज,
सत्य सिसकता रह गया, सुनता नहीं समाज।
ईमानों की हार पर, हँसता झूठा कौन—
झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन॥
जागो अब इंसान तुम, तोड़ो यह संजाल,
सत्य-अग्नि जल उठे, मिट जाए जंजाल।
जब बोलेगा सत्य फिर, चुप न रहेगा कौन—
झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन॥
डॉ. सत्यवान सौरभ
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक हैं।)






