कविता : इक मर्द दिखाई देता है, करुणा कलित हृदय में पीड़ा डेरा डाले सोती है, अनेक...
सिद्धार्थ गोरखपुरी
कविता : समझ, समझदारी से अगर कुछ समझ आया भी, तो इसे समझ का नाम-ओ-निशां न समझ, तेरी...
गीत : जर्रा-जर्रा, त्याग दिया मन की हर भाषा, आशा से तौबा कर डाला, मन से मन...
सिद्धार्थ गोरखपुरी जेहन का हर बोझ त्यागकर मन का हर इक संकोच त्यागकर भेद मैं मन के...
सिद्धार्थ गोरखपुरी कौन कहता है कठिन? आसान हो राधे! प्रेम की प्रमाणिकता का प्रमाण हो राधे! तुम्हारे...
सिद्धार्थ गोरखपुरी तेरे ही दिल में अबतक है मेरा बोरिया -बिस्तर ठहराव प्रिये तब भी क्यों होता...
सिद्धार्थ गोरखपुरी कमरे के अगले दरवाज़े से वो क्लास में पैठा करती थी लड़कियों वाली पहली पंक्ति...
सिद्धार्थ गोरखपुरी न पूछ के किस – किस तरहा से मजबूर हूँ अपनी रफ्तार से बस साढ़े...
सिद्धार्थ गोरखपुरी तुम मेरे हुए और सारे मशले हमारे हो गए मेरे यार! हम तो खुद के...
सिद्धार्थ गोरखपुरी चलो एक सिलसिला शुरू करते हैं खुद को खुद के रूबरू करते हैं खुद से...











