सिद्धार्थ गोरखपुरी न गली दीजिए न शहर दीजिए मुझको तो बस मेरी खबर दीजिए मकां तो रहने...
सिद्धार्थ गोरखपुरी
सिद्धार्थ गोरखपुरी किसी से बात कहनी हो किसी की बात सुननी हो मानवता और मुझमें से अगर...
सिद्धार्थ गोरखपुरी गलतफहमी है के अलाव सा है पिता घना वृक्ष है पीपल की छाँव सा है...
सिद्धार्थ गोरखपुरी न जीभ है न कंठ है कहने का न कोई अंत है दिखने में महज...
सिद्धार्थ गोरखपुरी रह-रह कर ये अक्सर सवाल आता है के क्या कभी मेरा भी खयाल आता है...
सिद्धार्थ गोरखपुरी ऐ मेघ ले – ले जद में अपने इस समूचे आसमां को कर दे गर्मी...
सिद्धार्थ गोरखपुरी माँ को न शहर अच्छा लगा न न शहर की शहरियत अच्छी लगी वो लौट...
सिद्धार्थ गोरखपुरी बचपने से सबको खुश कर देना और जवां होना। बस उँगलियों के इशारों से ,सब...
सिद्धार्थ गोरखपुरी रंग लो खुद को गाँव के रंग में तन – मन गाँव में ढाल के...













