सिद्धार्थ गोरखपुरी जो बिना थके सारा शहर चलाता है वो बड़ी मुश्किल से खुद का घर चलाता...
सिद्धार्थ गोरखपुरी
सिद्धार्थ गोरखपुरी पौवालय से पौवा लेकर डगमग पाँव से गाँव चले हीत -मित्र के प्रबल प्रेम में...
सिद्धार्थ गोरखपुरी दोनों नयन सावन बनकर रिमझिम-रिमझिम बरसात करें समझ तनिक आता ही नहीं के कितने हैं...
सिद्धार्थ गोरखपुरी मोहन! मुरली से प्रीत तुम्हारी अगाध अनन्त हुई कैसे प्रीत में पागल मीराबाई मन से...
सिद्धार्थ गोरखपुरी शिव का रंग चढ़ने लगा है शिवाला भी सजने लगा है भोले बाबा का गाना...
सिद्धार्थ गोरखपुरी वक्त कभी हालात नहीं समझता इश्क! मजहब, उमर, जात नहीं समझता खुदा की नजर में...
सिद्धार्थ गोरखपुरी जब भी इस दुनिया से मैं खुद को साझा करता हूँ मानो लगता है मुझको...
सिद्धार्थ गोरखपुरी सावन की बौछार यार तन – मन को भिगाती है मस्त फुहारें इस सावन की...
सिद्धार्थ गोरखपुरी सावन शिव हुए अवतरित धरती पर सावन में निज ससुराल गए हुआ अर्घ्य और जलाभिषेक...
सिद्धार्थ गोरखपुरी न द्वापर में हुए न कलयुग में हुए बताओ न? राधा के तुम किस युग...














