कविता : डगमग

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सिद्धार्थ गोरखपुरी

पौवालय से पौवा लेकर
डगमग पाँव से गाँव चले
हीत -मित्र के प्रबल प्रेम में
दिमाग़ में अनेक तनाव चले

दिमाग़ बना है बुलेट ट्रेन
जो बिन पटरी के दौड़ लगाए
अतीत के कठिन कलुष पन्नों पर
कलम सदृश घुडदौड़ मचाए
झट राजा झट रंक हो जाते
छण-छण में संग बदलाव चले
पौवालय से पौवा लेकर
डगमग पाँव से गाँव चले

ईएम डीएम पीएम सीएम
सारे जेब में रहते हैं
सारे पावरफुल पौवासेवी
इसी ऐब में रहते हैं
दोस्त भी खोजे हैं निज सम
नहीं कोई भी दुराव चले
पौवालय से पौवा लेकर
डगमग पाँव से गाँव चले

पौवालय पर बृहद भीड़ है
पानी चखना साथ मिले
जय – बीरु की यारी हो जाती
जब गिलास से गिलास मिले
फिर मौज समंदर में तैरें दोनों
फिर हौले से नशे की नाव चले
पौवालय से पौवा लेकर
डगमग पाँव से गाँव चले

मंगल ग्रह की कठिन भाषा का
बोध उन्हें हो जाता है
गर हिन्दी में कोई बात करे तो
क्रोध उन्हें हो जाता है
रह-रह कर मुँह में बोला करें
नहीं भाषा में तनिक ठहराव चले
पौवालय से पौवा लेकर
डगमग पाँव से गाँव चले

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