
यह ग़ज़ल समाज की कड़वी सच्चाइयों और इंसानी रिश्तों की जटिलताओं को उजागर करती है। इसमें शराफ़त, मजबूरी, संघर्ष और आत्मनिर्भरता के भाव गहराई से व्यक्त किए गए हैं। हर शेर जीवन के अनुभवों की सटीक अभिव्यक्ति है।
- ज़माने की फितरत और इंसान की हकीकत
- मोहब्बत, मजबूरी और संघर्ष की ग़ज़ल
- जब शराफ़त भी बन जाए सज़ा
- हकीकत के आईने में इंसान
बलजीत सिंह
शराफ़त का जो गाएगा तराना,
उसे ही काट खाएगा ज़माना।
जो ख़ुद डूबे हुए हों उनकी ख़ातिर,
बताओ लाज़िमी क्या डूब जाना।
फ़क़त माँगी मोहब्बत, कब कहा था,
सितारे आसमां से तोड़ लाना।
कोई जब थामने वाला न आया,
मेरे क़दमों ने छोड़ा लड़खड़ाना।
ज़रूरत सील देती है लबों को,
बहुत मुश्किल है खुल के मुस्कुराना।
बलजीत सिंह सुपुत्र श्री जोगिंदर सिंह
103/19, पुरानी कचहरी कॉलोनी
नज़दीक इम्प्रैशन इंस्टिट्यूट, हाँसी (हिसार) हरियाणा









