
यह कविता माँ के त्याग, वात्सल्य, आशीर्वाद और अनंत प्रेम को भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत करती है। रचनाकार ने माँ को जीवन का आधार, दुआ और सम्पूर्ण संसार बताते हुए उनकी महिमा का मार्मिक चित्रण किया है।
- माँ: प्रेम और वात्सल्य की प्रतिमा
- माँ का अनंत आशीर्वाद
- माँ से बढ़कर कुछ नहीं
- माँ: जीवन की सबसे बड़ी शक्ति
सिद्धार्थ गोरखपुरी
बच्चे की रूह, कद्र, बेसब्री
की दवा होती है,
माँ सिर्फ माँ होती है।
माँ अनंत… माँ संत,
माँ दिल… फेफड़ा, हवा होती है,
माँ सिर्फ माँ होती है।
बेकद्री के दौर में… जीवन के हर ठौर में,
माँ उन्नति का आशीष लिए दुआ होती है,
माँ सिर्फ माँ होती है।
विपदा की बारिश में… देवताओं से सिफारिश में,
माँ अग्रणी सभी में सदा होती है,
माँ सिर्फ माँ होती है।
माँ साकार…. बाकी सब निराधार,
माँ असल में समूचा जहां होती है,
माँ सिर्फ माँ होती है।
माँ भूख….. माँ भोजन,
जिसकी दुआएं अनंत
और तृप्ति अनंत योजन।
माँ जहां के हर कोने में
मकां होती है,
माँ सिर्फ माँ होती है।
माँ मन ज्ञानी… माँ आगम जानी,
वात्सल्य की देवी, साक्षात् भवानी।
माँ महज शब्दों में……
कहां बयां होती है,
माँ सिर्फ माँ होती है।
लिखने चला है मन
करके बहुत मनन,
शब्द कम पड़ रहे हैं….
कैसे बताऊँ
कि माँ क्या-क्या होती है।
अंत में यही लिखता हूँ—
माँ सिर्फ माँ होती है।








