
यह कविता माँ की ममता, त्याग, संघर्ष और स्नेह को भावपूर्ण शब्दों में अभिव्यक्त करती है। रचनाकार ने माँ को जीवन की सबसे बड़ी शक्ति और करुणा का सागर बताते हुए उनके आंचल की महिमा का गुणगान किया है।
- ममता की छांव
- माँ: जीवन की आधारशिला
- करूणा और त्याग की प्रतिमूर्ति
- माँ के आंचल की महिमा
भुवन बिष्ट
रानीखेत, उत्तराखण्ड
माँ का आंचल सारे जग में,
सदा-सदा ही प्यारा है।
हर विपदा को तुमने सहकर,
कांटों की राहों पर चलकर।
हर पल जीवन संवारा है,
माँ का आंचल प्यारा है।।
ममतामयी करूणा की सागर,
वह ममता की छांव है।
गिरकर उठना और संभलना,
माँ ने ही सिखलाया है।
दृढ़ निश्चय से मिले सफलता,
माँ तुमने ही दिखलाया है।।
आई विपदाएं भी अनेकों,
किया सामना डटकर तुमने,
हर सुख अपना न्यौछावर कर,
जीवन यह संवारा माँ।।
मानवता के धर्म-कर्म को,
हर पल माँ ने सिखलाया।
सागर की लहरों को उसने,
किश्ती बनकर पार किया।।
हर जन्म तेरा आंचल मैं पाऊं,
माँ तेरी छांव में पलूँ सदा।
ममतामयी करूणा की सागर,
करूं तेरा गुणगान सदा।।
माँ की ममता के आगे तो,
कठिन डग यहां हारा है।
माँ का आंचल सारे जग में,
सदा-सदा ही प्यारा है।।








