
यह बाल कहानी गांव के साहसी बालक सचिन की बहादुरी को दर्शाती है, जिसने तेंदुए के हमले से एक बच्ची और अपने साथियों की जान बचाई। घायल होने के बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी। उसकी वीरता से प्रभावित होकर जिला प्रशासन ने उसे राष्ट्रीय स्तरीय बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किया।
- बहादुर सचिन ने तेंदुए से बचाई बच्ची की जान
- स्कूल जाते समय सचिन ने दिखाई अद्भुत वीरता
- गांव के बच्चे की बहादुरी से भागा तेंदुआ
- राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित हुआ सचिन
सुनील कुमार माथुर
जोधपुर, राजस्थान
गांव में कोई स्कूल नहीं होने के कारण गांव के बच्चों को प्रतिदिन तीन से चार किलोमीटर दूर पढ़ने के लिए जाना पड़ता था और छुट्टी के बाद उतनी ही दूरी पैदल चलकर वापस आना पड़ता था। शुरू-शुरू में गोपाल, सुनील और चेतन को आने-जाने में बड़ी परेशानी होती थी, लेकिन सचिन ने उनकी हिम्मत बढ़ाई और सभी साथी एक साथ स्कूल आने-जाने लगे। रास्ते में वे गप्प-शप्प लड़ाते रहते, जिससे समय आसानी से निकल जाता और दूरी का पता भी नहीं चलता था।
15 अगस्त आने वाला था। स्कूल में स्वतंत्रता दिवस की तैयारियां चल रही थीं। इसी बीच 15 अगस्त से दो दिन पहले बच्चे स्कूल जा रहे थे, तभी सचिन ने देखा कि एक तेंदुआ एक बच्ची पर हमला करने वाला है। उसने बिना सोचे-समझे बच्ची को एक ओर कर तेंदुए से बचा लिया। इससे गुस्साए तेंदुए ने बच्चों की टोली पर हमला बोल दिया। लेकिन बहादुर सचिन उस तेंदुए से भिड़ गया और खुद जख्मी हो गया, लेकिन अपने साथियों और बच्ची को तेंदुए के हमले से बचा लिया।
इसी दौरान कुछ गांव वाले अपने खेतों की ओर जा रहे थे। जब उन्होंने सचिन और तेंदुए को लड़ते देखा, तो लाठियां बजाकर तेंदुए को वहां से भगा दिया और सचिन को गांव के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर उपचार के लिए ले गए। वहां उसका प्राथमिक उपचार किया गया।
इधर गोपाल, सुनील और चेतन घबराए हुए स्कूल पहुंचे और प्रधानाध्यापक को सारी बात बताई। वे तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे और डॉक्टर से सचिन के स्वास्थ्य की जानकारी ली। प्रधानाध्यापक ने इस घटना की जानकारी सचिन के परिजनों, शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों, जिला कलेक्टर और वन विभाग के अधिकारियों को दी। दूसरे दिन समाचार पत्रों में सचिन की बहादुरी की खबरें प्रकाशित हुईं।
15 अगस्त को जिला कलेक्टर ने अस्पताल पहुंचकर सचिन को उसकी बहादुरी के लिए राष्ट्रीय स्तरीय बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किया और उसके परिजनों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा, “धन्य हैं ऐसे माता-पिता, जिन्होंने ऐसे बहादुर बच्चे को जन्म दिया।”
कुछ दिनों के उपचार के बाद सचिन स्वस्थ हो गया। उसने कहा, “मैंने तो अपना फ़र्ज़ अदा किया। बचाने वाला तो परमात्मा है, मैं नहीं।” यह सुनकर सभी बच्चों और गांव वालों ने तालियां बजाकर सचिन का जोरदार स्वागत और अभिनंदन किया।





