
यह प्रेरक लेख जीवन में अच्छे लोगों के साथ संबंधों की महत्ता, समय के सदुपयोग, ज्ञान और अनुभव के संतुलन तथा करुणा और सेवा-भाव के महत्व पर प्रकाश डालता है। लेखक बताते हैं कि सफलता, सम्मान और सार्थक जीवन का आधार अच्छे संस्कार, आत्मविश्वास, विनम्रता और मानवीय संवेदनाएँ हैं।
- सफलता की असली नींव
- ज्ञान, अनुभव और जीवन का संतुलन
- करुणा से संवरता है जीवन
- सम्मान से बड़ा है चरित्र
सुनील कुमार माथुर
अच्छे इंसानों का हमारे जीवन में आना सौभाग्य की बात है, परन्तु उनसे अच्छे रिश्ते बनाए रखना हमारी योग्यता है। प्रायः लोग कहते हैं कि अमुक व्यक्ति फरिश्ता है। अमुक व्यक्ति दयावान व करुणामय है। उसके चेहरे पर कभी क्रोध नहीं देखा। आप भी उनका साथ दीजिए। अगर साथ नहीं हो पा रहा है तो कोई बात नहीं। उनके आदर्श संस्कारों को अपने जीवन में आत्मसात कर उसके अनुरूप कार्य कीजिए। बस आपका जीवन भी सेवाभावी हो जाएगा और आप भी करुणा के सागर में शामिल हो जाएँगे। यह आपकी योग्यता पर निर्भर करता है कि आप उस नेक कार्य को जीवन का अंग बनाते हैं या मात्र एक औपचारिकता।
सफलता की नींव
किसी भी नवीन कार्य को आरम्भ करने से पहले कुछ कठिनाइयाँ आ सकती हैं, लेकिन आपका लक्ष्य सही है। कुछ नया कर गुजरने की तमन्ना है तो आप अवश्य ही अपने लक्ष्य को हँसते-मुस्कुराते हासिल कर सकते हैं। जहाँ दृढ़ संकल्प हो, आत्मविश्वास हो, वहाँ कभी समस्या आ नहीं सकती, चूँकि जिसका ध्येय सभी के कल्याण हेतु हो, उसके साथ परमात्मा का आशीर्वाद सदैव बना रहता है। इसलिए वक्त का सही उपयोग ही सफलता की सबसे मजबूत नींव है।
ज्ञान और अनुभव
जीवन में किताबों का बड़ा ही महत्व है। हर व्यक्ति को जब भी समय मिले, तब अच्छे लेखकों की पुस्तकें पढ़नी चाहिए। मात्र मोबाइल से दिनभर चिपके नहीं रहना चाहिए। किताबें न केवल हमारा श्रेष्ठ मनोरंजन करती हैं, बल्कि ज्ञान भी देती हैं। ज्ञान जीवन में नई राह दिखाता है। इसलिए किताबों के साथ-साथ लोगों को भी पढ़ें। चूँकि किताबें ज्ञान देंगी और लोग अनुभव।
मगर आज का इंसान सम्मान के पीछे दौड़ रहा है। येन-केन प्रकारेण वह प्रमाण-पत्र प्राप्त करने की दौड़ में इतना आगे निकल गया है कि वह यह भी नहीं देख पा रहा है कि प्राप्त प्रमाण-पत्र पर किसी भी पदाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं। प्रमाण-पत्रों को रेवड़ियों की भाँति बाँटने वाली संस्था के पन्द्रह-पन्द्रह पदाधिकारियों के नाम पद सहित प्रकाशित हो रहे हैं, लेकिन किसी के भी डिजिटल या मूल (ओरिजिनल) हस्ताक्षर नहीं हैं, जो प्रमाण-पत्रों की उपादेयता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। सम्मान बिल्कुल एक आईने की तरह है। अगर आपने किसी गलत व्यक्ति को दिया है तो आपकी संस्था की प्रतिष्ठा अवश्य ही प्रभावित होगी।
करुणा रखिए, आवेश नहीं
इस ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं है। कब हम परलोक सिधार जाएँ। इसलिए जब तक हमें यह मानव जीवन मिला है, तब तक इसे समाज सेवा के कार्य में लगाइए। आपका जीवन सँवर जाएगा। चूँकि हम इस धरती पर ईश्वर की कृपा-दृष्टि तक ही हैं। इसलिए जीवन जीते हुए अपने भीतर करुणा रखिए, आवेश नहीं। क्योंकि बादलों की वर्षा से ही पुष्प खिलते हैं, उसकी गर्जना से नहीं। अतः जीवन में अहंकार, क्रोध व घमंड को तनिक भी स्थान न दें और करुणामय जीवन व्यतीत कीजिए।
सुनील कुमार माथुर
33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान





