
यह कविता आत्मा और देह के अंतर को आध्यात्मिक दृष्टि से प्रस्तुत करती है। इसमें बताया गया है कि नाम, पता, पद और वैभव क्षणिक हैं, जबकि आत्मा की पहचान शाश्वत है और उसका साक्षात्कार आत्मचिंतन से ही संभव है।
- आत्मा की पहचान का अनंत सफर
- नाम-पते से परे जीवन का सत्य
- स्वयं को जानने का आध्यात्मिक संदेश
- देह नहीं, आत्मा है सच्ची पहचान
डॉ. सत्यवान सौरभ
नाम-पता सब देह के, जग के मात्र निशान।
आत्मा का परिचय कहाँ, लिख पाए इंसान॥
मोबाइल, घर, गाँव सब, बदलें दिन सब काल।
मन के भीतर जो बसा, वही रहे निहाल॥
डाक-घर जाने पता, जाने जग पहचान—
आत्मा का परिचय कहाँ, लिख पाए इंसान॥
नाम बदलते जन्म में, बदलें कुल-परिवार।
भीतर बैठा साक्षी ही, रहता अपरम्पार॥
देह मिले या छूट जाए, अटल रहे पहचान—
आत्मा का परिचय कहाँ, लिख पाए इंसान॥
चलते-चलते खोजता, अपना ही अस्तित्व।
दर्पण में दिखता नहीं, अंतर का व्यक्तित्व॥
भीतर झाँके जो कभी, पाए सत्य-विधान—
आत्मा का परिचय कहाँ, लिख पाए इंसान॥
पद, वैभव, सम्मान सब, क्षणभर के मेहमान।
साथ न जाए एक भी, छूटे सब सामान॥
सत्य वही जो आत्म में, रहता सदा महान—
आत्मा का परिचय कहाँ, लिख पाए इंसान॥
जब तक खुद को जान ले, मिटे न मन का भ्रांत।
बाहर-बाहर ढूँढ़ता, रहता जीवन-प्रांत॥
अंतर-ज्योति जला सके, वही बने विद्वान—
आत्मा का परिचय कहाँ, लिख पाए इंसान॥
खुद को जिसने जान लिया, मिटा सकल संदेह।
नाम-पता सब रह गए, आत्मा ही है गेह॥
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक हैं।)
डॉ. सत्यवान सौरभ
कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पैनलिस्ट
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी), भिवानी, हरियाणा







