
यह प्रेरक बाल कहानी बताती है कि सच्चे मित्र कठिन परिस्थितियों में सबसे बड़ा सहारा बनते हैं। दोस्तों के सहयोग से मिली पुस्तकों ने अशोक की जिंदगी बदल दी और मेहनत के बल पर वह आगे चलकर एक विद्यालय का प्रधानाचार्य बना।
- दोस्ती का अनमोल उपहार
- किताबों ने बदली ज़िंदगी
- मेहनत, मित्रता और सफलता
- गरीबी से सफलता तक का सफर
सुनील कुमार माथुर
अशोक पढ़ने में काफी होशियार छात्र था। हर बार उसकी कक्षा में अच्छे अंक आते थे। लेकिन एक गरीब परिवार का लड़का होने के कारण वह सभी विषयों की पाठ्य-पुस्तकें खरीदने में असमर्थ था। यही वजह थी कि वह स्कूल में सभी विद्यार्थियों से अधिक अंक हासिल नहीं कर पा रहा था।
अशोक की गरीबी उसके मित्रों द्वारा देखी नहीं जा रही थी। अतः सभी मित्रों ने अपनी-अपनी हाथ-खर्ची इकट्ठा कर किताबें खरीदीं और अशोक के जन्मदिन पर उसे तोहफ़े के रूप में भेंट कीं। तोहफ़े में पाठ्य-पुस्तकें पाकर अशोक बेहद खुश हुआ। अब उसने नियमित रूप से सुचारु ढंग से पढ़ाई की और न केवल अच्छे अंक ही हासिल किए, अपितु पूरे स्कूल में टॉप किया।
जब प्रधानाचार्य जी ने उसे पूरे स्कूल में टॉप करने पर सम्मानित किया, तब अशोक ने अपने उद्बोधन में अपने सभी मित्रों के प्रति आभार व्यक्त किया, जिनकी बदौलत उसे पाठ्य-पुस्तकें मिलीं। सभी मित्रों व शिक्षकों ने अशोक का मुँह मीठा कराते हुए उसका हौसला-अफ़ज़ाई भी की।
नियमित अध्ययन के कारण अशोक अपने ही गाँव में एक निजी स्कूल का प्रधानाचार्य बना, जिसकी गाँव भर में सराहना की जा रही है।
सुनील कुमार माथुर
33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान






