वाह रे, लोक कल्याणकारी सरकार वाह…!

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सुनील कुमार माथुर

वाह रे! वाह लोक कल्याणकारी सरकार। तेरा भी क्या कहना हैं। बात-बात पर जनता से पैसा वसूलना तुझे खूब आता हैं। एक ओर वृक्षारोपण करा रही है और दूसरी ओर विकास के नाम पर हरे वृक्षों को काटा जा रहा हैं और बहुमंजिली इमारतें खडी की जा रही हैं। जमीनों के दाम बढा रही है। जन आवास के नाम पर जो आवास उपलब्ध करायें जा रहें है उनमें हल्का माल लगाया जा रहा हैं। भला ऐसे में इन्हें कौन खरीद पायेगा।

घर-घर गैस कनेक्शन देकर तूने गैस पर मिलने वाली सब्सिडी हडप ली। आयें दिन पेट्रोल , डीजल व रसोई गैस के दामों में बढोतरी की। सब्जियां मंहगी, दाले मंहगी, अनाज व अन्य खाध सामग्री मंहगी। वाह रे वाह! हमारी लोक कल्याणकारी सरकार। तेरा भी क्या कहना हैं। बात-बात पर जनता से पैसा वसूलना तुझे खूब आता हैं। आज हर खाध सामग्री व सौन्दर्य प्रसाधन की सामग्री मंहगी है। लेकिन फिर भी पहलें जैसी गुणवत्ता कहां है। हर वस्तु के दामों में भारी बढोतरी हो गयी फिर भी लोगों घटिया क्वालिटी की सामग्री बेची जा रही हैं।

पहले लोग शारीरिक श्रम करते थे इसलिए हष्ट पुष्ट रहते थें लेकिन आज हर कार्य मशीनों से होता हैं फिर भी पहलें की अपेक्षा अधिक लोग बीमार रह्ते है चूंकि कालाबाजारी करने वालों के साथ सरकारी कार्मिकों व अधिकारियों की मिलीभगत के चलतें मिलावटखोरों का गौरखधंधा धडल्ले से चलता हैं। वाह रे लोक कल्याणकारी सरकार बात-बात पर जनता से पैसा वसूलना तुझे खूब आता हैं। नीम्बू को कैसे निचोड़ा जाता हैं। यह तूझे खूब अच्छी तरह से आता हैं ठीक उसी प्रकार तूने आज जनता-जनार्दन को नीम्बू की तरह निचोड डाला हैं। वाह रे वाह ! लोक कल्याणकारी सरकार तेरा भी क्या कहना हैं।

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