जीवन चिंतन : गांव के लोग

जीवन चिंतन : गांव के लोग, वह मेरा पुराना दोस्त है और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रोफेसर के तौर पर खूब काम किया और कमाया। यहां आबादी का एक बड़ा तबका मजदूर, बिहार से राजीव कुमार झा की कलम से…
दिल्ली के काफी लोगों का नाम मुझे अब याद नहीं आता और इनमें यहां निकट रहने वाले लोग भी शामिल हैं लेकिन इन लोगों को बिल्कुल भूलना भी कठिन है.दिल्ली में प्रभात कुमार बसंत की पत्नी ने उसे छोड़ दिया और मुझे इन सब बातों में कोई रुचि नहीं है। यहां काफी लोग खुद को सीपीआई (एमएल) का भी बताते हैं और बेहद निठल्ले इन लोगों की आजीविका यहां जुगाड़ पर आधारित होती है।
मेरे पिता और फिर उनके देहांत के बाद घर के लोग बीएऔर एमए की पढ़ाई के दौरान मुझे पैसा भेजते रहे लेकिन पढ़ाई खत्म होने के बाद अच्छी नौकरी नहीं मिलने से अक्सर अभाव का सामना करना पड़ा और मुझे इन हालातों में रुपये पैसों से जुड़ी बातों की सच्चाई को जानने समझने का मौका मिला लेकिन यकीन कीजिए इनके बारे में सबकुछ आपको कभी बताऊंगा लेकिन क्या बसंत इसके बारे में लोगों को साफ-साफ कुछ बता सकता है।
वह मेरा पुराना दोस्त है और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रोफेसर के तौर पर खूब काम किया और कमाया। यहां आबादी का एक बड़ा तबका मजदूर के रूप में शहर के पुराने गांवों के आसपास बने ऐसे मकानों में रहता है जिनमें कमरों में लोग जिंदगी बसर करते हैं और अपने कामधाम छोटी मोटी कमाई के अलावा वह और कुछ नहीं सोच पाते हैं लेकिन मुझे इन लोगों के साथ भी रहने का मौका नहीं मिल पाया और काफी सालों तक रमणिका गुप्ता के कोटला वाले खाली फ्लैट में मेरा समय बीता।
इसी के पास ज्ञानपीठ में मैं काम भी करता था। बसंत की पत्नी ने उसे छोड़ दिया है, यह भी संभव है कि वह अब एक परित्यक्त नारी हो। सविता पटेल को भी असीम मिश्रा ने छोड़ दिया था और दिवाकर की पत्नी ने इसके बारे में मुझे बताया था। खैर बसंत की पत्नी सविता की तरह से जवान नहीं है जो उसे अमरीका से आया कोई एन आर आई आकर साथ ले जाये और बसंत को अपनी पत्नी पर अब कोई गर्व नहीं होगा।
मैंनेजर पांडेय का ज्यादातर जीवन जे एन यू में व्यतीत हुआ वह यहां पढ़ाता था और पत्नी को गांव में रखता रहा और इसके बारे में एक बार जब मैंने पूछा तो उसने मुझे हंसकर कहा कि वह काफी दिनों से पत्नी के पास सचमुच नहीं गया है और मुझे लगा कि अब वह वहां जायेगा लेकिन कुछ दिन पहले वह मर गया और अब इस शहर में उसका कोई अता पता नहीं है लेकिन बिहार के गोपालगंज में गांव के लोग उसे शायद नहीं भूल पाएंगे।
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