लेख में बाहरी स्वच्छता के साथ विचारों की स्वच्छता और वाणी पर संयम रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। लेखक अच्छे विचारों, सकारात्मक संवाद, सुख-शांति-समृद्धि और दूसरों की मदद करने को बेहतर जीवन का आधार बताते हैं। साथ ही मुस्कुराते रहने, श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने और समाज में अच्छे विचारों का प्रसार करने की प्रेरणा दी गई है।
- गंदे कपड़ों से ज्यादा गंदे विचार
- विचारों की स्वच्छता भी जरूरी
- अच्छे विचार, सुखी जीवन
- हँसते-मुस्कुराते रहिए
सुनील कुमार माथुर
प्रातःकाल मैं अपने मोबाइल फोन पर व्हाट्सऐप पर आए सुप्रभात देख रहा था, तभी एक कथन पढ़ने को मिला कि जब इंसान को गंदे व मैले कपड़ों में शर्म आती है तो गंदे व मैले विचारों में भी शर्म आनी चाहिए। उक्त कथन ने मेरे हृदय की गहराइयों तक को छू गया और मेरी लेखनी लिखने को चल पड़ी। व्यक्ति को अपनी कथनी और करनी में अंतर नहीं रखना चाहिए और वाणी पर संयम रखना चाहिए ताकि बिगड़े बोल न बोले। वाणी पर नियंत्रण से ही हम अपने श्रेष्ठ विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का नेक काम कर सकते हैं। इसलिए जब भी बोलें तब सोच-समझकर ही बोलें एवं श्रेष्ठ वचन ही बोलें, ताकि आपकी वाणी से किसी की भावनाओं को ठेस न पहुँचे।
बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि लोग कीचड़ से इसलिए बचकर निकलते हैं ताकि अपने कपड़े खराब न हो जाएँ, लेकिन कीचड़ को यह घमंड हो जाता है कि लोग उससे डरते हैं। अतः कहने का तात्पर्य यह है कि जिसकी जैसी सोच होती है, वह वैसा ही सोचता है और वैसा ही करता है। कहते हैं कि अच्छी बातें पढ़ने की आदत हो तो अच्छी बातें करने की आदत लग ही जाती है। जब आप समाज में अच्छी बातें करते हैं। किसी समस्या के समाधान पर अपना ठोस पक्ष रखते हैं तो समाज में आपकी साख स्वतः ही बन जाती है। इसलिए संवाद करते रहिए और श्रेष्ठ पत्र-पत्रिकाओं को हर रोज पढ़कर अपने मस्तिष्क को और अपने विचारों को अपडेट करते रहिए।
जब आपके विचार श्रेष्ठ होंगे तभी आप जन-जन के होंगे। जीवन में सुख, शांति और समृद्धि यह तीन मोती हैं, जिनसे आपके जीवन की डोर बंधी रहनी चाहिए। सुख, शांति और समृद्धि ही जीवन की बगिया को खुशबू वाले वातावरण से महका देते हैं। जैसे जब सवेरे-सवेरे पुष्प खिलता है तब हमारे मन-मस्तिष्क को आनंदित करता है और दिन भर अपने आस-पास के वातावरण को खुशनुमा बनाए रखता है और शाम को बिखर कर मिट्टी में मिल जाता है और नए पुष्प के लिए बेहतर खाद के रूप में सहयोग करता है, तो क्या हम इंसान होकर भी किसी जरूरतमंद की मदद नहीं कर सकते।
किसी महापुरुष ने बहुत ही सुंदर बात कही है कि उम्र बढ़ने से मुस्कुराहट नहीं रुकती, लेकिन मुस्कुराहट रुकने से उम्र जल्दी बढ़ जाती है। इसलिए हर हाल में हँसते-मुस्कुराते रहिए और ठहाके लगाते रहिए। यही लंबी आयु तक जीवन जीने का मूल मंत्र है। फिर देर किस बात की। हँसते-हँसते जीवन व्यतीत करें और दूसरों को भी करने दीजिए।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पालरोड, जोधपुर, राजस्थान

