इस साक्षात्कार में डॉ. आरुषि ने ‘स्वयं को जानें’ का अर्थ अपने व्यक्तित्व और जीवन को पहचानने के साथ दूसरों की सेवा में स्वयं को समर्पित करने से जोड़ा है। उन्होंने अपनी शिक्षा, डॉक्टर बनने की यात्रा, सर्जरी में विशेषज्ञता और रचनात्मक रुचियों के बारे में जानकारी साझा की है। बातचीत के अंत में उन्होंने युवाओं को माता-पिता और अभिभावकों से निरंतर संवाद बनाए रखने तथा स्वस्थ और प्रसन्न समाज की कामना करने का संदेश दिया है।
- सेवा से स्वयं को जानने का सफर
- डॉ. आरुषि ने साझा किया जीवन का मूलमंत्र
- शिक्षा, सेवा और सपनों की उड़ान
- युवाओं से संवाद और सेवा का संदेश
सुनील कुमार माथुर
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इंसान मशीन की तरह काम कर रहा है। उसके पास पल भर का भी वक़्त नहीं है कि वह किसी के पास बैठकर कुछ देर के लिए संवाद करे। बातचीत करे। क्योंकि वह दिन-रात हाय धन, हाय धन कर रहा है, फिर भी इतना सारा कमाने के बाद भी संतुष्ट नहीं है। जीवन में सब कुछ धन-दौलत, आन, बान, शान ही नहीं है। प्रतिष्ठा अपनी जगह है और जिम्मेदारियाँ अपनी जगह हैं।
बस तालमेल बैठाते हुए कार्य करते रहना चाहिए। आज सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि हम अपने रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ घंटों का समय अपने माता-पिता और परिवारजनों को दें। चूँकि उन्हीं की बदौलत हम आज अपने इस मुकाम पर हैं। हमारे जोधपुर संवाददाता सुनील कुमार माथुर ने जब डॉ. आरुषि से बातचीत की तब उसने स्वयं को जानें का मूल मंत्र साझा किया।
सुनील : स्वयं को कैसे जानें?
डॉ. आरुषि : स्वयं को जानें का अर्थ मेरी निगाह में यह है कि अपने आप को पहचानें कि मैं क्या था और क्या हो गया। दूसरे शब्दों में “स्वयं को जानने का सर्वश्रेष्ठ तरीका, अपने आप को औरों की सेवा में डूबो देना है।” डॉ. आरुषि ने बताया कि उनकी दसवीं तक की शिक्षा पोकरण के केंद्रीय विद्यालय से हुई। पिताजी पीएचईडी वाटरवर्क्स पोकरण में सहायक अभियंता पद से रिटायर हुए व माताजी ने एम.एससी. केमिस्ट्री तक की पढ़ाई की और वह एक कुशल गृहणी हैं।
सुनील : क्या शुरू से ही आपको पढ़ाई के लिए प्रोत्साहन मिला?
डॉ. आरुषि : जी हाँ। बचपन से ही माता-पिता ने पढ़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया। इस वजह से हर कक्षा में अव्वल नंबर आते थे। माँ से प्रेरित होकर ग्यारहवीं कक्षा में बायोलॉजी सब्जेक्ट चूज किया और डॉक्टर बनने का सपना देखने लगी। उस समय परिवार के सभी सदस्य जोधपुर शिफ्ट हो गए। शुरुआत में विषय को समझने में काफी परेशानी हुई और परीक्षा में नंबर भी कम आते थे, परंतु हार न मानने की ठान ली थी। फिर एक साल घर पर पढ़ाई करने के बाद गीतांजली मेडिकल कॉलेज, उदयपुर में एम.बी.बी.एस. के लिए दाखिला हो गया एवं पढ़ने में एक मज़ा सा आने लगा।
साढ़े पाँच साल कैसे पूरे हुए पता ही नहीं चला। अब यह सवाल था कि आगे क्या करना है। दो साल अलग-अलग अस्पताल में काम करने के बाद सर्जन बनने का निर्णय लिया। फिर नीट पीजी परीक्षा के ज़रिए डी.एन.बी. जनरल सर्जरी, नारायणा अस्पताल, जयपुर में चयन हुआ। रेजीडेंसी के इन तीन साल में टीचर्स ने कई मूल मंत्र सिखाए व हमेशा नई तकनीक सीखने के लिए उत्साहित किया। उनसे प्रभावित होकर डॉ. आरुषि अभी संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल से फेलोशिप इन रोबोटिक/मिनिमल इनवेसिव सर्जरी कर रही हूँ, जिससे ऑपरेशन के पश्चात दर्द कम होगा, जल्दी खाना-पीना शुरू होना, अस्पताल में कम समय के लिए रुकना व इन्फेक्शन कम होने की संभावना रहेगी।
सुनील : मरीजों की सेवा करते हुए भी क्या आप अपनी अन्य गतिविधियों को पूरा करती हो?
डॉ. आरुषि : हाँ…. हाँ……। पढ़ाई के अलावा मुझे चित्रकारी, डांस, फोटोग्राफी, गाने, खेल-कूद व ट्रैवलिंग का भी शौक है एवं जब भी समय मिलता है तब अपनी रुचि की गतिविधियों को उड़ान भरने देती हूँ और उन्हें पूरे उत्साह व उमंग के साथ पूरा करती हूँ।
उन्होंने बताया कि उनकी छोटी बहन डीआरडीओ, जोधपुर में सीनियर रिसर्च फैलो के पद पर काम कर चुकी हैं व भाई गूगल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। वे बताती हैं कि मेरी बस यही दुआ है ईश्वर से कि विश्व भर की जनता हमेशा स्वस्थ रहें और मस्त रहे एवं युवाओं से विशेष आग्रह है कि वे अपने माता-पिता और अभिभावकों से निरंतर संवाद बनाए रखें ताकि उनके मन में भी उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप खुशियों के फूल खिलें और वे भी अपने बच्चों की प्रगति व उन्नति पर आनंदित हो सकें। उनके चेहरे की मुस्कान ही हमारे लिए ईश्वर का आशीर्वाद है।
सुनील कुमार माथुर
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार एवं
सदस्य अणुव्रत लेखक मंच
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पालरोड, जोधपुर, राजस्थान

