देवभूमि उत्तराखंड में मां नंदा-सुनंदा के नंदा महोत्सवों की धूम और भक्तिमय वातावरण का वर्णन किया गया है। आलेख में कदली वृक्ष से मां नंदा-सुनंदा की मूर्तियों की स्थापना, प्राण प्रतिष्ठा, धार्मिक मान्यताओं और महोत्सव से जुड़ी परंपराओं का उल्लेख है। साथ ही नंदा महोत्सवों को सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक एकता, सामाजिक सहभागिता और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों व प्रतियोगिताओं की जानकारी दी गई है।
- देवभूमि में गूंज रहे मां नंदा-सुनंदा के जयकारे
- नंदा महोत्सव से सजी देवभूमि
- आस्था और संस्कृति का पर्व नंदा महोत्सव
- कदली वृक्ष से साकार होती हैं मां नंदा-सुनंदा
भुवन बिष्ट, रानीखेत (उत्तराखंड)
रानीखेत। देवभूमि उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्व विख्यात है तो यह देवों की तपोभूमि के रूप में भी जानी जाती है और देवभूमि में सदैव होता है अटूट आस्था का संगम। देवभूमि उत्तराखंड में आजकल मां नंदा-सुनंदा के जयकारे से गुंजायमान हो रहे अनेक क्षेत्रों में नंदा महोत्सव की धूम मची हुई है। मां नंदा देवभूमि उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल और कुमाऊँ मंडल सहित हिमालय के अन्य भागों में जनसामान्य की लोकप्रिय देवी के रूप में जानी जाती हैं। नंदा देवी अल्मोड़ा हो या नैना देवी नैनीताल व कुमाऊँ के सभी शहरों व कस्बों में हो रहे हैं, मां नंदा-सुनंदा के भक्तिमय वातावरण से समस्त देवभूमि में नंदा देवी महोत्सवों की धूम मची हुई है। कुमाऊँ सहित देवभूमि में सभी स्थानों में मां नंदा-सुनंदा की कदली वृक्ष को लाकर स्थापना की जाती है और होता है माता नंदा-सुनंदा का गुणगान….
जय जय माँ नंदा सुनंदा, माता दिये वरदान।
देवभूमि की माता प्यारी, भौते छन महान।
माता नंदा-सुनंदा की स्थापना के लिए सर्वप्रथम कदली वृक्ष को भक्तों द्वारा पूजा-अर्चना करके सम्मान के साथ मंदिर लाया जाता है। फिर माता नंदा-सुनंदा की भव्य मूर्तियों के रूप में इन्हें आकार प्रदान किया जाता है। और फिर नंदाष्टमी के साथ प्राण प्रतिष्ठा व स्थापना का कार्य किया जाता है। इसके बाद नंदा-सुनंदा की पूजा-अर्चना के साथ महोत्सव का आरंभ हो जाता है। माता नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किए जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं। देवी भगवती की छः अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है। नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है। शक्ति के रूप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं। मान्यता है कि चंद्रवंशीय राजा के घर नंदा के रूप में देवी प्रकट हुई। उनके जन्म के कुछ समय बाद ही सुनंदा प्रकट हुई। इनके संदर्भ में हिमालय में एक मान्यता यह भी है कि राज्यद्रोही षड्यंत्रकारियों ने उन्हें कुटिल नीति अपना कर भैंसे से कुचलवा दिया था। भैंसे से बचने के लिए देवी ने कदली वृक्ष में छिपने का प्रयास किया। इसी दौरान एक जंगली बकरे ने केले के पत्ते खाकर उन्हें भैंसे के सामने कर दिया। बाद में वही कन्याएँ पुनर्जन्म लेकर नंदा, सुनंदा के रूप में अवतरित हुईं और राजद्रोहियों के विनाश का कारण भी बनीं। एक मूर्ति को नंदा और दूसरी को गौरा देवी की मान्यता प्राप्त है। और कदली के वृक्ष से ही नंदा-सुनंदा की मूर्तियों को आकार प्रदान किया जाता है।
माता नंदा के अनेक नामों में प्रमुख हैं शिवा, सुनंदा, शुभानंदा, नंदिनी। देवभूमि उत्तराखंड में समान रूप से पूजे जाने के कारण मां नंदा-सुनंदा को धार्मिक एकता के सूत्र के रूप में देखा गया है। मां नंदा चंद वंशीय राजाओं के साथ संपूर्ण उत्तराखंड की विजय देवी थीं। हालांकि कुछ विद्वान उन्हें राज्य की कुलदेवी की बजाय शक्तिस्वरूपा माता के रूप में भी मानते हैं। देवभूमि के सभी क्षेत्रों में मां नंदा देवी महोत्सवों की धूम मची है और नंदा देवी महोत्सव में विभिन्न प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, भजन-कीर्तनों का भी आयोजन किया जाता है। देवभूमि सदैव ही देवों की तपोभूमि रही है। महोत्सव सदैव ही एकता के सूत्र में हमें बाँधते हैं और प्रत्येक आयोजन महोत्सव भी कुछ न कुछ प्रेरणा अवश्य देते हैं। आधुनिक चकाचौंध में तेजी से आ रहे सांस्कृतिक शून्यता की ओर जाते दौर में भी यह महोत्सव न केवल अपनी पहचान कायम रखने में सफल रहे हैं वरन इसने सर्वधर्म समभाव की मिसाल भी पेश की है। पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देते हैं महोत्सव। एकता, अखंडता व सांस्कृतिक विरासत की पहचान महोत्सवों को संजोए रखने की आवश्यकता है।
भव्य मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा व स्थापना से होता है शुभारंभ
माता नंदा-सुनंदा की स्थापना के लिए सर्वप्रथम कदली वृक्ष को भक्तों द्वारा पूजा-अर्चना करके सम्मान के साथ मंदिर लाया जाता है। फिर माता नंदा-सुनंदा की भव्य मूर्तियों के रूप में इन्हें आकार प्रदान किया जाता है। और फिर नंदाष्टमी के साथ प्राण प्रतिष्ठा व स्थापना का कार्य किया जाता है। इसके बाद नंदा-सुनंदा की पूजा-अर्चना के साथ महोत्सव का आरंभ हो जाता है।
देवभूमि में सभी को एकता के सूत्र में बाँधते हैं महोत्सव
देवभूमि सदैव ही देवों की तपोभूमि रही है। महोत्सव सदैव ही एकता के सूत्र में हमें बाँधते हैं और प्रत्येक आयोजन महोत्सव भी कुछ न कुछ प्रेरणा अवश्य देते हैं। आधुनिक चकाचौंध के दौर में तेजी से आ रही सांस्कृतिक शून्यता की ओर जाते दौर में भी ये महोत्सव अपनी पहचान कायम रखने में सफल रहे हैं। महोत्सवों ने सर्वधर्म समभाव की मिसाल भी पेश की है। नंदा महोत्सव पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है।
विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी होता है आयोजन
नंदा महोत्सव में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी धूमधाम से किया जा रहा है, वहीं विद्यालयी विद्यार्थियों द्वारा भी रंगारंग कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी जा रही है। ऐपण, मेंहदी, झोड़ा गायन, कला आदि विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जा रहा है।

