कविता छोटे आकार, सीमित साधनों या छोटी शुरुआत को कमजोरी न मानकर बड़े विचार, साहस, मेहनत और दृढ़ संकल्प के महत्व को रेखांकित करती है। बूँद, दीपक, चींटी, बीज, किरण और नन्हे पंखों जैसे प्रतीकों के माध्यम से बताया गया है कि छोटी-सी कोशिश भी बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकती है। रचना अंततः कर्मों से अपनी पहचान बनाने और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का संदेश देती है।
- छोटे कदम, बड़ी मंजिल
- नन्ही कोशिशों की बड़ी उड़ान
- छोटा कोई नहीं
- हौसला हो तो सब संभव
डॉ. प्रियंका सौरभ
छोटा हूँ तो क्या हुआ, मन में बड़ा विचार।
बूँद-बूँद से भर रहा, सागर का भंडार।।
नन्हा दीपक क्या करे, पूछे जग संसार।
अँधियारा छँटता वही, जब जले एक बार।।
कद छोटा हो तो रहे, हौसला आसमान।
पर्वत भी झुकता कभी, देखे दृढ़ इंसान।।
कण-कण मिलकर बन गया, धरती का आकार।
छोटा कोई भी नहीं, यदि भीतर है सार।।
बूँद अकेली क्या करे, हँसे अगर संसार।
बूँद-बूँद मिलकर बने, सागर देख अपार।।
चींटी छोटी है मगर, चढ़ती ऊँचा शैल।
मेहनत जिसके साथ हो, जीत उसी का खेल।।
नन्हा बीज दिखे मगर, भीतर वन का राज।
समय मिले तो दे सके, धरती को नव साज।।
छोटी-सी मुस्कान में, छिपा बड़ा संसार।
जिसने दिल से दे दिया, उसका ऊँचा प्यार।।
शब्द भले हों चार ही, रखते गहरा मोल।
सच्चे मन से निकलकर, खोलें मन के बोल।।
छोटी-सी कोशिश करे, बदल सके हालात।
एक कदम ही खोलता, मंजिल तक की बात।।
नन्ही किरणें भोर की, हरती तम हर बार।
छोटा होकर भी बने, सूरज का आधार।।
माटी का कण क्या करे, सोच रहा हर हाल।
मिलकर वही बना सके, सुंदर भवन विशाल।।
छोटी नाव भँवर फँसी, रखती अपना मान।
जिसके भीतर साहस हो, पार करे तूफान।।
छोटी गलती मानकर, बड़ा बने इंसान।
झुकने वाला ही सदा, पाता सच्चा मान।।
कम साधन से भी रचे, सपनों का संसार।
हिम्मत जिसके पास हो, उसको क्या दरकार।।
नन्हे पंखों से उड़ें, सपने लेकर साथ।
आकाशों की दूरियाँ, बन जाती दो हाथ।।
छोटा हूँ तो क्या हुआ, भीतर मेरा मान।
कर्मों से पहचान हो, यही बड़ी पहचान।।
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)

