उदयपुर की कवयित्री चित्रलेखा व्यास ‘नीलचित्रा’ ने बातचीत में अपने जीवन, शिक्षा, साहित्यिक यात्रा, हिंदी एवं मेवाड़ी भाषा में लेखन और गायन के प्रति अपनी रुचि के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर साहित्य की बदलती प्रस्तुति, साहित्य में संवेदना और भाषा-सौंदर्य बनाए रखने तथा मेवाड़ी भाषा, संस्कृति और लोक परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए। साक्षात्कार में उदयपुर की संस्कृति, उनके प्रिय रचनाकारों और भविष्य में अपनी रचनाओं को गेय रूप में प्रस्तुत करने की इच्छा की झलक भी मिलती है।
- शब्दों और संवेदनाओं की कवयित्री हैं चित्रलेखा ‘नीलचित्रा’
- मेवाड़ी मेरी मिट्टी, संस्कृति और पहचान की आवाज है
- साहित्य, संस्कृति और संगीत से जुड़ा चित्रलेखा का सफर
- सोशल मीडिया के दौर में साहित्य की संवेदना जरूरी
प्रश्न – 1. आप उदयपुर की हैं। यहाँ अपने जीवन के बारे में संक्षेप में अपनी बाल्यावस्था, माता-पिता, शिक्षा और अन्य प्रसंगों के बारे में बताइए।
उत्तर – मेरा नाम चित्रलेखा व्यास ‘नीलचित्रा’ है। मेरा जन्म 11 जून 1996 को कानोड़, उदयपुर में हुआ। मेवाड़ी परिवेश ने मेरे व्यक्तित्व को प्रभावित किया। मेरे माता-पिता, श्री मदन मोहन व्यास और श्रीमती बन्नी देवी ने मुझे संस्कार दिए। मैंने बी.सी.ए., हिंदी साहित्य और एम.सी.ए. की शिक्षा प्राप्त की। मेरे पति का नाम निलेश चौबीसा है। परिवार और मातृत्व के साथ शिक्षा व लेखन जारी रखना मेरे लिए प्रेरणादायक रहा।
प्रश्न – 2. आपने हिंदी और अंग्रेजी के अलावा अपनी मेवाड़ी भाषा में भी साहित्य लेखन किया है। अपनी प्रकाशित पुस्तकों और रचनाओं के बारे में बताते हुए संक्षेप में अपनी लेखन यात्रा से अवगत कराइए।
उत्तर – मैं हिंदी और मेवाड़ी में गीत, लोकगीत और अन्य रचनाएँ लिखती हूँ। मेरी मेवाड़ी रचनाएँ अभी अप्रकाशित हैं, पर काव्य-गोष्ठियों में प्रस्तुत हो चुकी हैं। मेरी हिंदी कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं और साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हुई हैं। मैं एक साझा संकलन की सह-लेखिका हूँ और स्वतंत्र पुस्तक प्रकाशित करना चाहती हूँ।
प्रश्न – 3. आज फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर साहित्य, विशेषकर कविता लेखन, गहन भावों और विचारों से दूर सस्ती लोकप्रियता और मनोरंजन की तरफ उन्मुख प्रतीत होता है। इस बारे में आप अपने विचारों से अवगत कराएँ।
उत्तर – फेसबुक पर मेरी आईडी chitralekhavyas नाम से है। इंस्टाग्राम पर मेरी आईडी @meri.kalammyview नाम से है। इन सोशल मीडिया मंचों पर मैंने अपनी रचनाएँ साझा की हैं और अपने सम्मान-पत्रों तथा साहित्यिक उपलब्धियों का भी उल्लेख किया है। इनके माध्यम से पाठकों और साहित्यप्रेमियों से जुड़ने का अवसर मिलता है।
सोशल मीडिया साहित्य को व्यापक पाठकों तक पहुँचाने वाला मंच है। समस्या माध्यम में नहीं, उसके उपयोग में है। लाइक और व्यूज़ की प्रतिस्पर्धा में रचनाएँ सतही हो सकती हैं। कविता मनोरंजन के साथ संवेदना, विचार और आत्ममंथन का माध्यम भी है। गुणवत्ता और लोकप्रियता का संतुलन आवश्यक है।
प्रश्न – 4. सोशल मीडिया पर साहित्य की उपस्थिति और उसकी प्रस्तुति से किस प्रकार का बदलाव साहित्य लेखन में कायम होता दिखाई देता है?
उत्तर – सोशल मीडिया ने साहित्य को ऑडियो, वीडियो, रील और मंचीय रूपों तक विस्तारित किया है। इससे नए रचनाकारों को अवसर मिले हैं, पर त्वरित प्रभाव के कारण रचनाएँ सतही भी हो सकती हैं। माध्यम बदल सकता है, लेकिन साहित्य की संवेदना, गहराई और भाषा-सौंदर्य बने रहना चाहिए।
प्रश्न – 5. आप अपने प्रिय कवियों और लेखकों के बारे में बताइए।
उत्तर – मेरे प्रिय रचनाकारों में तुलसीदास, कबीर, सूरदास, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, दिनकर, बच्चन और मैथिलीशरण गुप्त प्रमुख हैं। आज के प्रसिद्ध नवयुवा हिंदी रचनाकारों में मैं गीत चतुर्वेदी, नीलोत्पल मृणाल, गौरव सोलंकी, अनुकृति उपाध्याय, दिव्या विजय और ज्योति जैन को भी पसंद करती हूँ। महादेवी की संवेदनशीलता, कबीर की निर्भीकता, दिनकर का ओज, तुलसी की लोकमंगल भावना और पंत की प्रकृति-संवेदना मुझे प्रेरित करती है।
प्रश्न – 6. उदयपुर शहर के इतिहास, यहाँ के जनजीवन और संस्कृति के बारे में संक्षेप में जानकारी दीजिए।
उत्तर – उदयपुर राजस्थान का ऐतिहासिक शहर और ‘झीलों की नगरी’ है। महाराणा उदय सिंह द्वितीय ने 1559 में इसकी स्थापना की। राजमहल, झीलें, हवेलियाँ, मंदिर, लोककला और स्थापत्य इसकी विरासत हैं। मेवाड़ी भाषा, लोकगीत, नृत्य, वेशभूषा और त्योहार यहाँ के जनजीवन को जीवंत बनाते हैं।
प्रश्न – 7. मेवाड़ी राजस्थान की लोकभाषा है। सारे देश में लोकभाषाओं के सामने संकट की परिस्थिति है। अपनी भाषा, संस्कृति, अस्मिता की गरिमा और इससे हमारे प्रेम के बारे में आपका क्या मत है?
उत्तर – मेवाड़ी मेरी मिट्टी, संस्कृति और पहचान की आवाज है। इसमें लोकगीत, लोककथाएँ और पीढ़ियों के अनुभव सुरक्षित हैं। आधुनिकता से लोकभाषाएँ संकट में हैं। उनका संरक्षण दैनिक जीवन, शिक्षा और लेखन में सम्मानजनक स्थान देकर ही संभव है। मैं मेवाड़ी में लिखती हूँ और नई पीढ़ी से इसके संवर्धन की अपेक्षा रखती हूँ।
प्रश्न – 8. संगीत में अपनी अभिरुचि के बारे में बताइए।
उत्तर – मुझे लोकगीत और भावप्रधान गीत पसंद हैं। राजस्थानी (मेवाड़ी) लोकगीतों में अपनी मिट्टी और लोकजीवन की धड़कन सुनाई देती है। कविता और संगीत भावनाओं की प्रभावी अभिव्यक्ति हैं। मुझे अपनी रचनाओं को गेय रूप में प्रस्तुत करना अच्छा लगता है और भविष्य में उन्हें स्वयं स्वर देना चाहती हूँ।
संक्षिप्त परिचय
नाम – चित्रलेखा व्यास
उपनाम – नीलचित्रा
जन्मतिथि – 11/06/1996
पिता – मदन मोहन व्यास
माता – बन्नी देवी
पति – निलेश चौबीसा
शिक्षा – बी.सी.ए. कपासन (2015), एम. ए. अंग्रेजी साहित्य (MLSU, Udaipur), बी. ए. हिंदी साहित्य (MLSU, Udaipur), एम.सी.ए. जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ, डिपार्टमेंट ऑफ़ कंप्यूटर साइंस एंड टेक्नोलॉजी, उदयपुर (राजस्थान) (2025)
पुस्तक प्रकाशन : सहलेखिका
- Sturmfrei
- Butterflies And Broken Heart
- शब्दों का आसमान
- मैं और मेरे महादेव
- सावन के झूले, तीज के गीत
- भारत की बेटी
- कच्चे धागों की पक्की यादें
- Soulprints of Friendships
- Garden of Words
- Scars & Stars
- Tree of Memories
- EverGreen Qill
Awards
Petals of Poetry
- देश की अन्य अनेक साहित्यिक संस्थाओं के द्वारा कविता लेखन के लिए सम्मानित।
- प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन और सोशल मीडिया के साहित्यिक मंचों पर काव्य पाठ के कार्यक्रमों में भागीदारी।
साहित्य सृजन : मुख्यतः हिंदी एवं राजस्थानी (मेवाड़ी) भाषा में कविता, गीत, कहानी तथा लोकगीतों का।
विशेष अभिरुचि : गायन कला।

