अंकिता भंडारी प्रकरण के चार साल, भाजपा के विधायकों का चुनावी सर्वे, हरीश रावत के इस्तीफे की पेशकश और 1320 मेगावाट बिजली खरीद पर उठे सवालों ने उत्तराखंड की सियासत को गरमा दिया है। इसी बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का युवाओं से संवाद सरकार के विकास और भविष्य के विजन को सामने रखता है, लेकिन युवाओं के सवाल रोजगार, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर भी केंद्रित हैं। चुनाव से पहले इन मुद्दों का असली महत्व इस बात में है कि राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर जनता के सवालों पर कितने स्पष्ट जवाब और ठोस कार्ययोजना रखते हैं।
- अंकिता से अडानी तक: उत्तराखंड की राजनीति में पांच बड़े सवाल
- चुनाव की आहट के बीच उत्तराखंड में बढ़ी सियासी तपिश
- इस्तीफे, सर्वे, बिजली और युवा: पहाड़ की राजनीति का नया एजेंडा
- उत्तराखंड पूछ रहा है सवाल, सत्ता और विपक्ष के पास क्या हैं जवाब?
राज शेखर भट्ट
उत्तराखंड की राजनीति में इस समय अलग-अलग दिखने वाले कई मुद्दे एक ही राजनीतिक तस्वीर के अलग-अलग हिस्से बनते दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ अंकिता भंडारी हत्याकांड के चार साल पूरे होने पर न्याय और कथित वीआईपी एंगल से जुड़े सवाल फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में हैं, दूसरी तरफ 2027 विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा अपने विधायकों के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए अंतिम सर्वे की तैयारी में है। इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ओर से पार्टी पद छोड़ने की पेशकश का पत्र सामने आया है। 1320 मेगावाट बिजली खरीद प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस के सवाल और सरकार का जवाब भी राजनीतिक बहस को नया आयाम दे रहे हैं। इन सबके बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का 18 सितंबर को 140 चयनित विद्यार्थियों के साथ संवाद भी महत्वपूर्ण है। ‘सपनों का उत्तराखंड’ अभियान के तहत विद्यार्थियों से प्रदेश के भविष्य को लेकर सुझाव लिए गए हैं। इससे पहले बड़ी संख्या में छात्रों ने पलायन, रोजगार, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति, पर्यटन, पर्यावरण तथा नशे जैसे विषयों पर अपने विचार रखे थे। यानी सत्ता के मंच पर विकास और भविष्य की बात है, तो जनता के बीच बुनियादी सुविधाओं और रोजगार की चिंता भी मौजूद है।
अंकिता भंडारी: चार साल बाद भी सवाल खत्म नहीं हुए
18 सितंबर अंकिता भंडारी हत्याकांड की चौथी बरसी है। मामले में तीन दोषियों को उम्रकैद की सजा हो चुकी है, लेकिन कथित वीआईपी एंगल और जांच से जुड़े सवालों को लेकर विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से लगातार आवाज उठती रही है। देहरादून में श्रद्धांजलि सभा और मानव श्रृंखला का कार्यक्रम भी रखा गया है। यह मामला केवल एक आपराधिक घटना तक सीमित नहीं रहा। उत्तराखंड में महिला सुरक्षा, प्रभावशाली लोगों की जवाबदेही और जांच की पारदर्शिता जैसे सवाल इससे लगातार जुड़े रहे हैं। राजनीतिक दल भी समय-समय पर इसे सरकार के खिलाफ मुद्दे के रूप में उठाते रहे हैं। 17 सितंबर को मुख्यमंत्री के एक कार्यक्रम से पहले कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी कथित वीआईपी की पहचान सार्वजनिक करने समेत कई मुद्दों को लेकर विरोध किया था। चार साल बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि राजनीतिक बयानबाजी से आगे इस मामले में जनता को कितनी स्पष्ट और प्रमाणित जानकारी मिलती है। किसी भी आरोप को तथ्य मान लेने के बजाय जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्षों को आधार बनाना जरूरी है। लेकिन लोकतंत्र में यह सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है कि जिन सवालों को लेकर समाज में लगातार बेचैनी है, उनका आधिकारिक जवाब क्या है।
भाजपा का सर्वे और 2027 की तैयारी
2027 विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। भाजपा के मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन को लेकर प्रस्तावित अंतिम सर्वे में लोकप्रियता, क्षेत्र में विकास कार्य, जनता के बीच छवि, संगठन के साथ तालमेल, चुनावी प्रदर्शन और स्थानीय समस्याओं के समाधान जैसे छह मानकों का उल्लेख किया गया है। पिछली विधानसभा में पार्टी जिन 23 सीटों पर चुनाव हार गई थी, उन पर भी विशेष ध्यान दिए जाने की खबर है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आने वाला चुनाव केवल सरकार के चेहरे और प्रदेश नेतृत्व का चुनाव नहीं होगा; स्थानीय विधायक और स्थानीय मुद्दे भी टिकट और चुनावी रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। कुछ हालिया मीडिया सर्वे भाजपा के पक्ष में मजबूत चुनावी अनुमान पेश कर रहे हैं, लेकिन ऐसे सर्वे को जनादेश नहीं माना जा सकता। चुनाव अभी भविष्य में है और उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण, मुद्दे, संगठनात्मक गतिविधियां तथा मतदाताओं की प्राथमिकताएं समय के साथ बदल सकती हैं। इसलिए असली सवाल सर्वे के आंकड़े नहीं, बल्कि यह है कि विधायक अपने क्षेत्रों में जनता के बीच कितने जवाबदेह दिखाई देते हैं।
कांग्रेस के सामने संगठन और नेतृत्व का सवाल
दूसरी तरफ कांग्रेस के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की ओर से पार्टी के पद छोड़ने की पेशकश ने नई राजनीतिक चर्चा शुरू कर दी है। रावत ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल को पत्र भेजकर प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी सदस्य पद छोड़ने की पेशकश की है। सामने आई जानकारी के अनुसार उन्होंने कहा कि वह अपने कर्मों की लड़ाई खुद लड़ेंगे और उनकी वजह से पार्टी की आगामी चुनावी मुहिम प्रभावित न हो, इसलिए पार्टी को भारमुक्त करने की पेशकश कर रहे हैं। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब कांग्रेस को 2027 की तैयारी करनी है। इसलिए व्यक्तिगत राजनीतिक घटनाक्रम से अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि पार्टी संगठनात्मक एकजुटता, नेतृत्व, स्थानीय मुद्दों और सरकार के खिलाफ प्रभावी राजनीतिक एजेंडे को किस तरह आगे बढ़ाती है। उत्तराखंड में विपक्ष के लिए केवल सरकार की आलोचना पर्याप्त नहीं होगी। जनता के सामने वैकल्पिक नीतियां और स्थानीय समस्याओं के समाधान की स्पष्ट योजना भी रखनी होगी।
1320 मेगावाट बिजली: आरोप बनाम सरकार का जवाब
1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली खरीद प्रक्रिया भी इन दिनों राज्य की राजनीति का बड़ा मुद्दा है। कांग्रेस ने प्रक्रिया और टेंडर की शर्तों में बदलाव को लेकर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि इससे अदाणी पावर को फायदा पहुंचा। दूसरी ओर उत्तराखंड सरकार ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि परियोजना टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के जरिए अदाणी पावर को मिली। ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि UJVNL और THDC India के संयुक्त उपक्रम के माध्यम से परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी क्योंकि NTPC ने THDC को तापीय बिजली उत्पादन में शामिल होने की अनुमति नहीं दी थी। यहीं लोकतांत्रिक बहस का वास्तविक महत्व सामने आता है। विपक्ष के आरोप और सरकार का स्पष्टीकरण—दोनों जनता के सामने हैं। अब जरूरी है कि टेंडर की शर्तें, प्रतिस्पर्धी बोली, बिजली की दर, दीर्घकालीन वित्तीय प्रभाव और राज्य के उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले असर जैसे दस्तावेजी तथ्यों पर बहस हो। केवल राजनीतिक आरोप या राजनीतिक बचाव से जनता को पूरी तस्वीर नहीं मिलेगी।
युवा संवाद: भाषण से आगे रोजगार का सवाल
मुख्यमंत्री का 140 युवाओं के साथ संवाद ऐसे समय हो रहा है जब प्रदेश के युवा रोजगार, पलायन और बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। ‘मेरे सपनों का उत्तराखंड’ अभियान में छात्रों की ओर से पलायन रोकने, गांवों में रोजगार और सुविधाएं बढ़ाने, सरकारी स्कूलों-अस्पतालों को बेहतर करने, पर्यटन और पर्यावरण पर काम करने तथा हेलीकॉप्टर एंबुलेंस जैसी सुविधाओं के सुझाव सामने आए। यही वह जगह है जहां राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण होता है। पहाड़ का युवा केवल यह नहीं पूछता कि उत्तराखंड कैसा दिखेगा; वह यह भी पूछता है कि उसका रोजगार कहां होगा, उसका गांव क्यों खाली हो रहा है, उसके नजदीक बेहतर अस्पताल कब होगा और उसके बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए मैदान की ओर क्यों जाना पड़ेगा। ‘विकसित उत्तराखंड’ की परिभाषा इसलिए केवल बड़े प्रोजेक्ट, सड़कें और निवेश नहीं हो सकती। इसमें स्थानीय रोजगार, पलायन पर रोक, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक अवसर भी शामिल होने चाहिए।
पांच मुद्दे, एक बड़ा राजनीतिक सवाल
अंकिता भंडारी मामला जवाबदेही और न्याय की मांग को सामने रखता है। भाजपा का विधायक सर्वे संगठन और उम्मीदवार चयन की चुनौती को दिखाता है। हरीश रावत का प्रकरण कांग्रेस के सामने संगठन और नेतृत्व का सवाल रखता है। 1320 मेगावाट बिजली परियोजना सत्ता और विपक्ष के बीच पारदर्शिता तथा आर्थिक हितों की बहस को सामने लाती है। और युवाओं का संवाद बताता है कि अगली पीढ़ी उत्तराखंड से क्या चाहती है। इन पांचों मुद्दों को जोड़कर देखें तो उत्तराखंड की राजनीति अब केवल सत्ता बनाम विपक्ष की बहस नहीं रह गई है। असली लड़ाई विश्वसनीयता, जवाबदेही, रोजगार, विकास और जनता के सवालों के स्पष्ट जवाब की है। 2027 का चुनाव आने में समय है। इसलिए अभी किसी दल या नेता के पक्ष में निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन आज के राजनीतिक घटनाक्रम यह जरूर बता रहे हैं कि आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति में भावनात्मक मुद्दों के साथ-साथ काम का हिसाब और भविष्य की ठोस योजना भी महत्वपूर्ण बहस बनने वाली है।
जनता के सामने अब सवाल सरल है—कौन क्या कह रहा है, यह नहीं; कौन अपने दावे के समर्थन में क्या तथ्य, क्या परिणाम और क्या स्पष्ट योजना रख रहा है?



