कविता : मानवीय मूल्यों की रक्षा की खातिर

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सुनील कुमार माथुर

33, वर्धमान नगर, शोभावतो की ढाणी, खेमे का कुआ, पालरोड, जोधपुर (राजस्थान)

हमारे भामाशाह साधुवाद व धन्यवाद के पात्र हैं
जिन्होंने कोरोना काल में जिन बच्चों ने
अपने माता पिता को व अन्य परिजनों को खो दिया
उनके लिए शिक्षा , भोजन , वस्त्र और
रहने की व्यवस्था की
तीज – त्योहारों पर उन्हें मिठाई व नमकीन देकर
मानवीय मूल्यों की रक्षा की खातिर
अपना मानव धर्म को निभाया हैं
ऐसे तमाम भामाशाह साधुवाद व धन्यवाद के पात्र हैं
अपने परिवारजनों के लिए तो हर कोई करता है
जो निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करें
वही तो मानवता है , वही तो हमारे संस्कार हैं
वही तो दया , करूणा ,ममता ,
वात्सल्य का भाव हैं चूंकि
मानव सेवा ही सबसे बडी सेवा है
दुःख की घडी में जो दुखीजन की
पीडा को समझें , उनकी मदद करें
वहीं तो प्रभु की असली सेवा हैं और
ये निस्वार्थ भाव से दुखीजन और
पीडितों की सेवा करने वालें भामाशाह
ये ही तो असली भगवान हैं
ऐसे तमाम भामाशाह साधुवाद व धन्यवाद के पात्र हैं
मानव ही मानव के काम आता हैं
तभी तो कहीं स्वर्ग है तो इस धरती पर ही हैं
जहां सेवा के लिए हाथ बढता हैं
वही पर असली लोकतंत्र है

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