
कंचन के समान जीवन, ठीक उसी प्रकार इंसान के हुनर को भी चुराना एक कठिन कार्य है। अतः हमें शिक्षित होकर आगे बढना हैं। ज्ञानवान बनना है और आज्ञानता के अंधकार को दूर करना होगा, पढ़ें जोधपुर (राजस्थान) से सुनील कुमार माथुर की कलम से…

अपने जीवन को संवारना भी एक कला हैं। यह कला तभी आती हैं जब हम सकारात्मक सोच को अपनाते है और नकारात्मक सोच का त्याग करते है और जिसने इस कला को सीख लिया उसका जीवन कंचन के समान है। लडाई, झगडों, मनमुटाव, राग ध्देष, शंका, घृणा व नफरत से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं हैं।
जो इन बुराइयों से घिर जाता हैं। उसका जीवन नर्कमय व चौपट हो जाता हैं। जीवन में चारों ओर उसे परेशानियां ही परेशानियां नजर आती हैं। अतः ज्ञान के सागर में डूबकी लगाकर इन तमाम बुराइयों से बचें। किसी महापुरुष ने बहुत सुंदर बात लिखी है कि इंसान मधुमक्खियों का शहद भले ही चुरा ले, लेकिन उनकी शहद बनाने की कला को नही़ चुरा सकता हैं।
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ठीक उसी प्रकार इंसान के हुनर को भी चुराना एक कठिन कार्य है। अतः हमें शिक्षित होकर आगे बढना हैं। ज्ञानवान बनना है और आज्ञानता के अंधकार को दूर करना होगा तभी एक नये समाज व राष्ट्र का नव निर्माण होगा। बस परेशानियों को प्यार व स्नेह से सुलझाते रहें।
दीपक की लौ को जो अखंड ज्योत में परिवर्तित कर देते हैं वे ही लोग सेवाभावी होते हैं। ऐसे लोगों के मन में दया, करूणा, ममता व वात्सल्य का जज्बा होता हैं। वे जब ठान लेते है तब वे ज्योत से ज्योत जलाते चलते रहते हैं और एक वक्त ऐसा आता हें जब ज्योत की रोशनी से समूचा परिवार, समाज व राष्ट्र जगमगाने लगता हैं और वह ज्योत है भक्ति की।
आज हमारे कथावाचक जगह जगह कथा करके कथा के माध्यम से जन जन में भक्ति की ज्योत जगा रहे हैं जिसकी वजह से ही इस राष्ट्र में भलमानसता देखने को मिल रही है अन्यथा आज का इंसान भेडिए से भी खतरनांक स्थिति में पहुंच गया है। अतः उन्हें उस दलदल से बाहर निकालने का एक ही रास्ता है ईश्वर की भक्ति। भक्ति में ही वह शक्ति है जो गंदगी में भी कमल खिला सकती हैं व अज्ञानता के अंधकार में ज्ञान का दीप जला सकती हैं
जिस दिन भक्ति की ज्योत बूझ जायेगी उस दिन हमारी सभ्यता और संस्कृति का पतन निश्चित हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति भक्ति के बल पर ही ठहरी हुई है जिस पर कभी भी आंच नहीं आनी चाहिए।
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