पवित्र भाव और जीवन का कल्याण

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सुनील कुमार माथुर

आज की इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में इंसान मशीनरी जीवन व्यतीत कर रहा हैं और पाश्चात्य संस्कृति को अपना कर वह अपने ही देश की संस्कृति एवं अध्यात्म ज्ञान को भूलता जा रहा हैं । आज इंसान की स्थिति यह हो गयी हैं कि उसके सोचने समझने की शक्ति ही समाप्त होती जा रही हैं फिर भी वह अपनी ही बात मनवाने के लिए बेतुकी बातें कर रहा हैं और बेतुके तर्क दे रहा हैं जो एक चिन्ताजनक बात हैं दुःख की बात यह है कि आज युवापीढ़ी को वक्त पर सही मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं है ।

आज हर कोई अपने स्वार्थ में अंधा हैं । उसे दूसरों की पीडा से कोई भी लेना देना नहीं है ऐसे में युवा वर्ग हताश व निराश होकर आत्महत्या कर रहा हैं । जबकि आत्महत्या करना एक दंडनीय अपराध हैं । अतः व्यक्ति को हमेशा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए व नकारात्मक सोच व विचारों से दूर रहना चाहिए । खुद भी अच्छे कर्म करे व दूसरों को भी अच्छे कर्म करनें के लिए प्रेरित करें तथा नेक कार्यों को करने वालों को प्रोत्साहित करना चाहिए । उनका हौसला अफजाई करे । उनका मनोबल बढाया जाना चाहिए । उन्हें शाबाशी व धन्यवाद दे ।

गलत कार्य करनें वालों को सही मार्गदर्शन दे । उन पर अपने विचार जबरन न थोपे अपितु प्रेम से समझाइए कि गलत कार्य करने से खुद का , परिवार का , समाज व राष्ट्र का ही नुकसान होता हैं । अतः बुराइयों का त्याग करके ही हम अपने जीवन को संवार सकते हैं और बुरे कर्मों , पाप और बुराइयों से मुक्ति पा सकते हैं । बस जरूरत है तो दृढ इच्छा शक्ति व दृढ संकल्प की ।

अतः अपने विवेक का सहारा लेकर सदैव अच्छे कर्म करें , प्रभु की भक्ति करें , जरूरतमंद लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा करें , दान – पुण्य करें और आदर्श जीवन व्यतीत करें । मन में सदैव सुन्दर व अच्छे विचारों का समावेश करें । मन में पवित्र भाव हो तो जीवन का कल्याण अवश्य ही होगा ।

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