
यह कुमाऊँनी कविता माँ (ईजा) के त्याग, ममता, संस्कार और जीवन-निर्माण में उनकी भूमिका का भावपूर्ण वर्णन करती है। रचनाकार ने माँ के संघर्षों, शिक्षाओं और निस्वार्थ प्रेम को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया है। कविता मातृदिवस के अवसर पर माँ के प्रति कृतज्ञता और सम्मान की सुंदर अभिव्यक्ति है।
- ईजा के त्याग और ममता का भावपूर्ण गुणगान
- मातृदिवस पर कुमाऊँनी भाषा में माँ को समर्पित रचना
- माँ के संस्कारों और संघर्षों का काव्यात्मक चित्रण
- ‘ईजा’ : जीवन की प्रथम गुरु को नमन
भुवन बिष्ट
ईजा तू छै भौत महान,
करनूँ हाँम त्यार गुणगान।
कोख में धरिं नौ म्हैणा,
करौं कष्ट तिलै पावणा।
हाथ पकणि हिटण सिखाई,
यौ दुणिं त्वील संसार दिखाई।
घूरि बेर उठण तिलै बताई,
भौल मति लै तिलै सिखाई।
जीवनौक हर बाटौ में,
दिई ईजा तिलै ज्ञान।
ईजा तू छै भौत महान,
करनूँ हाँम त्यार गुणगान।।
सिखाई ईजा भौल बुलाण,
यौ दुणिं में दिई पछाण।
दिई तिलै भाल संस्कार,
करौ उज्याव मिटाय अन्यार।
पढ़ाय-लेखाय ज्ञान बढ़ाई,
दुणिं में हामौर मान बढ़ाई।
मानवता लै तिलै बताई,
धरम-करम तिलै सिखाई।
आपण सुख करीं न्यौछार,
दुणिं में बणां भौल परिवार।
त्यौर कष्टौ कौ छौ सम्मान,
ईजा तू छै भौत महान।।
हर जनम त्यौर आँचल मिलो,
हाँम सदा करूँ यैक आश।
आयी कतु सुख-दुःख लै,
बिता कष्ट दिन-रात जास।
ईजा आशीर्वादैल त्यौर,
बढ़ी जीवन में हामौर मान।
ईजा तू छै भौत महान,
करनूँ हाँम त्यार गुणगान।
रचनाकार : भुवन बिष्ट
(रानीखेत, उत्तराखंड)








