बाल कहानी : सूझबूझ

बाल कहानी : सूझबूझ, बस फिर क्या था सभी ने उस बालक का उपचार कराने का संकल्प लिया और देखते ही देखते उनके अथक प्रयासों से 50 हजार रूपये इकट्ठे हो गये और संजय का उपचार हो गया। सुनील कुमार माथुर, जोधपुर
संजय, गोपाल, चेतन व सुनील एक ही स्कूल में पढते थे, लेकिन उनकी क्लासे अलग – अलग थी। वे इंटरवेल में एक साथ भोजन करते थे। जब तक वे एक – दूसरे से मिल नहीं लेते तब तक उन्हें चैन नहीं पडता था।
संजय कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपनी मम्मी के साथ उदयपुर चला गया। लेकिन फिर काफी दिनों तक स्कूल नहीं लौटा। जब अन्य मित्रों ने पता किया तब मालुम पडा कि संजय काफी दिनों से बीमार हैं और उदयपुर भी न जा सका।
उसके माता-पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वो किसी प्राइवेट अस्पताल मे़ अपना उपचार करा सके। तब गोपाल ने अपने मित्र के बारे में अपने पिता से बात की चूंकि गोपाल के पिता काफी साधन सम्पन्न थे। बच्चों ने मिलकर अपने गुलक की राशि एकत्र की जो करीबन चार हजार रूपये हुई।
गोपाल के पिता ने अपने आफिस में स्टाफ के संग चर्चा की एक प्रतिभाशाली विधार्थी बीमार है और उसके परिजन के पास उपचार हेतु धन नहीं हैं। बस फिर क्या था सभी ने उस बालक का उपचार कराने का संकल्प लिया और देखते ही देखते उनके अथक प्रयासों से 50 हजार रूपये इकट्ठे हो गये और संजय का उपचार हो गया।
कुछ दिनों के उपचार व आराम के बाद संजय फिर स्कूल जाने लगा। उसने व उसके परिजनों ने सभी सहयोगियों व भामाशाहों के प्रति आभार व्यक्त किया और गोपाल की व बच्चों की सूझबूझ के लिए उनके प्रति विशेष आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इनकी सूझबूझ से आज संजय ठीक हो पाया। ईश्वर सभी अभिभावकों को ऐसी संतान दे, जिनमें परोपकार की भावना हो।
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