लघुकथा : वेदना का इलाज

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

“सुनील… ओ सुनील… यह वेदना मुझसे सही नहीं जा रही। सुनील बेटा जरा डाक्टर को फोन कर के बुलाओ न।” रामप्रसाद घर में अकेले बैठे चिल्ला रहे थे, “अरे कोई तो करो इसका इलाज। घर में कोई मेरी सुन क्यों नहीं रहा है। यह लता न जाने क्यों कहां रुक गई? अभी तक बाजार से आई ही नहीं।”

रामप्रसाद चिल्ला कर जो कह रहे थे, सामने वाले मकान में रहने वाला चिराग उनकी ये बातें सुन-सुन कर परेशान हो रहा था। रामप्रसाद की हालत पर उसे बड़ी दया आती थी। छह महीने पहले रामप्रसाद की पत्नी लता की एक दुर्घटना में मौत हो गई थी। बेटा सुनील सात साल पहले दिल्ली जाने की बात कह कर घर से निकला तो आज तक उसका कुछ पता ही नहीं चला था। अकेले जीवन जीने की कोशिश में रामप्रसाद अपना मानसिक संतुलन खो बैठे थे। अक्सर उनके सीने में दर्द होता तो वह सुनील को पुकारते।

धीरे-धीरे रामप्रसाद की यह पुकार सुनने की पड़ोसियों की आदत पड़ गई थी। कभी किसी के पास समय होता तो उनके पास चला जाता और थोड़ी देर बैठ कर वापस आ जाता। इसके बाद वह थोड़ी देर के लिए इस तरह शांत हो जाते, जैसे उन्हें कुछ हुआ ही नहीं। पर वह अभी भी घर में पत्नी और बेटे को देखते थे।

हमेशा की तरह उस दिन भी रामप्रसाद बेटे और पत्नी को पुकार रहे थे कि कोई दरवाजा खोल कर उनके घर में घुसा। इसके बाद रामप्रसाद और उस आदमी के फफकफफक कर रोने की आवाज पड़ोसियों को साफ सुनाई दे रही थी। कुतूहल वश लोग जब रामप्रसाद के घर पहुंचे तो देखा कि कोई आदमी रामप्रसाद से लिपटा रो रहा था और रामप्रसाद भी उसे पकड़ कर जोर-जोर से रो रहे थे।

जब दोनों का मन थोड़ा शांत हुआ तो चिराग पानी का गिलास ले कर उनके पास पहुंचा। उसने जब उस आदमी को देखा तो वह रामप्रसाद का बेटा सुनील था। सुनील पूरे सात साल बाद घर वापस आया था। उसने अपनी जो आपबीती सुनाई वह बहुत ही दर्दनाक थी।

धोखेधड़ी के झूठे आरोप में सुनील जेल चला गया था। खुद को निर्दोष साबित करने में उसे पांच साल लग गए थे। दो दिन पहले ही वह जेल से छूटा था। जेल से छूटते ही मां-बाप का हालचाल लेने सीधे गांव के लिए चल पड़ा था। मां की मौत और पिता की हालत देख कर वह परेशान हो उठा था।

बेटे को सामने पा कर रामप्रसाद की वेदना का इलाज हो चुका था।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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वीरेंद्र बहादुर सिंह

लेखक एवं कवि

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जेड-436-ए, सेक्टर-12, नोएडा-201301 (उत्तर प्रदेश) | मो : 8368681336

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देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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