कवयित्री रूणा रश्मि ‘दीप्त’ से समाज संस्कृति से जुड़े सवाल

राजीव कुमार झा
कवयित्री रूणा रश्मि ‘ दीप्त ‘ की कविताओं में नारी के सहज मन का राग विराग सुंदरता से समाया है और इनमें समाज संस्कृति से जुड़े सवाल भी शिद्दत से मुखर हुए हैं ! यहां प्रस्तुत है इनसे राजीव कुमार झा की बातचीत !
नाम : रूणा रश्मि ‘दीप्त’
जन्म तिथि : 10 जनवरी 1970
शिक्षा: एम . ए. (हिंदी)
लेखन अभिरुचि: कविताएँ, लघुकथा और आलेख लेखन (हिन्दी एवं मैथिली), दैनिक भास्कर, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर जैसे समाचार पत्रों के साथ साथ कई ई पेपर्स और किस्सा कोताह, साहित्य एक्सप्रेस, साहित्यनामा, साहित्योदय, अविरल प्रवाह आदि विभिन्न पत्रिकाओं के साथ साथ कई ई-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित।
- दो एकल काव्य संकलन प्रकाशित
1. प्रथम रश्मि
2. भाव प्रसून - दो अन्य काव्य संग्रह शीघ्र प्रकाश्य !
साक्षात्कार में पूछे गये प्रश्न…
- आप कवयित्री हैं , आपको कविता अपनी किन विशिष्टताओं से आकृष्ट करती रही है ?
मुझे कविता पढ़ने का अत्यधिक शौक बचपन से ही रहा है। लयबद्ध कविताओं के प्रति मेरा विशेष झुकाव रहा है। इसी झुकाव के परिणामस्वरूप मेरी सृजन प्रक्रिया भी लयबद्ध कविताओं की राह पर ही चल पड़ी।
मेरा मानना है कि किसी भी कवि या कवयित्री की रचना ऐसी हो जो समाज को सदैव ही एक सरल और सार्थक दिशा प्रदान कर सके। समाज की बुराइयों की ओर ध्यानाकर्षण के साथ ही साथ उसकी अच्छाइयों को भी उजागर करते हुए प्रेरक रचना का निर्माण होना चाहिए।
सुंदर भाव और शिल्प के साथ ही साथ एक प्रवाहयुक्त कविता सभी पढ़ने वालों को आकृष्ट करती है। साथ ही साथ यदि भाषा भी सरलता पूर्वक ग्राह्य हो तब पाठक के मन मस्तिष्क में उस कविता को एक विशिष्ट स्थान की प्राप्ति होती है।
- जिन कवियों – लेखकों की रचनाओं ने आपको काफी प्रभावित किया उनके बारे में बताएं ?
रामधारी सिंह दिनकर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, मैथिली शरण गुप्त, हरिवंश राय बच्चन, सुभद्रा कुमारी चौहान आदि कई महान कवियों की कविताएँ मुझे बहुत पसंद आती हैं। इसके साथ ही साथ कबीर और रहीम के दोहे पढ़ने में भी मुझे अत्यंत ही आनंद की अनुभूति होती है।
- आप अपने बचपन माता – पिता घर द्वार से जुड़ी स्मृतियों को साझा कीजिए !
मैं एक ऐसे परिवार में पली बढ़ी हूँ जहाँ माता-पिता के साथ ही साथ अन्य कई रिश्तेदार भी शिक्षा के क्षेत्र से ही जुड़े हुए थे। घर में सदैव ही पठन पाठन का वातावरण रहा है। घर में आने-जाने वाले लोग भी ज्यादातर वही होते थे. जिन्हें पापा से कुछ ज्ञान हासिल करना होता या कोई पुस्तक प्राप्त करनी होती थी या फिर जो पापा के निर्देशन में पी- एच.डी कर रहे होते थे।
हमारे घर का ज्यादातर हिस्सा पापा के पुस्तक संग्रहालय के रूप में ही प्रयुक्त होता था। इतना ही नहीं उस विशाल संग्रह में पापा को अपनी एक-एक पुस्तक का स्थान अच्छी तरह याद रहता था जिन्हें आवश्यकतानुसार एक बार में ही निकाल लेते थे, ज्यादा ढ़ूँढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। इस बात से अन्य आगंतुक भी अत्यधिक प्रभावित होते थे और इसकी चर्चा भी अक्सर होती रहती थी।
- आज का साहित्यिक परिवेश कैसा लगता है ! महिला लेखन की पहचान के बारे में क्या कहना चाहेंगी ?
आज का साहित्यिक परिवेश पूर्व से बहुत भिन्न है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म ने आज के साहित्य सेवियों की राह कुछ सरल बना दी है। सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति को लोगों तक पहुँचाना कुछ सरल हो गया है। अब अपनी रचनाओं को पाठक तक पहुँचाने के लिए किसी पत्रिका या अखबार में प्रकाशित होने की प्रतीक्षा करना अनिवार्य नहीं रह गाया है।
पाठकों की प्रतिक्रिया भी सहजतापूर्वक मिल जाती है जिससे सृजन को परिष्कृत करना सरल होता है। जहाँ तक महिलाओं का प्रश्न है, वर्तमान काल में महिला रचनाकारों की संख्या में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है, जिसमें सभी वय की महिलाएँ शामिल हैं और अपने भावपूर्ण, संवेदनशील सृजन से हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में अपनी महती भूमिका निभा रही हैं।
- साहित्य के अलावा अपनी अन्य अभिरुचियों के बारे में बताएं ?
मैं एक गृहिणी होने साथ ही साथ विभिन्न सामाजिक क्रियाकलापों में भी उत्साहपूर्वक अपनी भागीदारी निभाती हूँ। नृत्य संगीत में भी मेरी अभिरुचि है। विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन भी मैं कुशलतापूर्वक कर लेती हूँ। (ऐसा सभी का कहना है)
- कवयित्री के रूप में समाज को क्या सन्देश देना चाहेंगी ?
कवयित्री या फिर एक सामान्य इंसान (विशेषतौर पर एक महिला) के रूप में मैं अपने समाज से इतना ही कहना चाहूँगी कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष और महिला दोनों को ही समकक्ष मानना चाहिए, कोई किसी से कम या अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। दोनों इस संसार के आधार स्तंभ हैं, इस बात को कभी न भूलें और सदैव एकदूसरे का सम्मान करें।
हाँ! एक रचनाकार के रूप में मैं सभी को एक और बात बताना चाहती हूँ कि कोई भी रचनाकार अपनी कथा अथवा कविता के माध्यम से जो भी भावाभिव्यक्ति करता है, उसमें बहुत कुछ तो अपने आसपास के परिवेश में देखता और महसूस करता है और उसी के आधार पर कुछ हद तक कल्पना भी करता है।
ऐसा कतई आवश्यक नहीं है कि रचनकार ने जो कुछ भी लिखा है वो उसका कोई व्यक्तिगत अनुभव हो। रचनाओं के आधार पर किसी भी सृजनकार की व्यक्तिगत परिस्थितियों का आकलन करना सर्वथा अनुचित है।
¤ प्रकाशन परिचय ¤
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From »राजीव कुमार झाकवि एवं लेखकAddress »इंदुपुर, पोस्ट बड़हिया, जिला लखीसराय (बिहार) | Mob : 6206756085Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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