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डोभी प्रखंड में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया छठ व्रत का त्यौहार

अर्जुन केशरी

गया, बिहार। आज दिन रविवार कों जिला के डोभी प्रखंड अंतर्गत बकसोती स्थित निरंजना नदी के घाट पर श्री छठ पूजा समिति एवं युवा ज्योति छठ पूजा समिति कि तरफ से व्रतियों के लिए भव्य व्यवस्था किया गया। श्रद्धांलूयों के बीज फल का वितरण भी गया गया। यहां पर लाखो कि संख्या में दूर दूर से श्रद्धालु गन पहुंचे।

आज व्रती निर्जला रहकर संध्या अर्घ्य के लिए प्रसाद तैयार करेंगी, फिर सूप, दउरा में सभी तरह के फलों से सजाकर दउरा तैयार किया जाएगा। साथ ही केले का घौद, गन्ना आदी नदी किनारे या जलाशल तक माथे पर लेके जाने की विशेष मान्यता है।निर्जला व्रत छठ के चौथे या अंतिम दिन के सूर्योदय तक जारी रहेगा। फिर अगले दिन सूर्य भगवान और छठी मैय्या को उषा अर्घ्य दिया जाएगा।

छठ के अंतिम दिन अर्घ्य के बाद, बांस की टोकरियों से प्रसाद पहले व्रतियों द्वारा खाया जाता है और फिर परिवार के सभी सदस्यों और व्रतियों में वितरित किया जाता है।आज के दिन व्रती तालाब, नदी आदि पानी के स्रोत में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देंगी। छठ व्रत का महत्व लखनऊ. उत्तर प्रदेश और खासकर बिहार में छठ का विशेष महत्व है। छठ सिर्फ एक पर्व नहीं है, बल्कि महापर्व है, जो पूरे चार दिन तक चलता है।

नहाए-खाए से इसकी शुरुआत होती है, जो डूबते और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर समाप्त होती है। ये पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को ‘चैती छठ’ और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को ‘कार्तिकी छठ’ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए ये पर्व मनाया जाता है। इसका एक अलग ऐतिहासिक महत्व भी है। माता सीता ने भी की थी सूर्यदेव की पूजा छठ पूजा की परंपरा कैसे शुरू हुई, इस संदर्भ में कई कथाएं प्रचलित हैं।

एक मान्यता के अनुसार, जब राम-सीता 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, तब रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगाजल छिड़ककर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। इससे सीता ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।

महाभारत काल से हुई थी छठ पर्व की शुरुआत

हिंदू मान्यता के मुताबिक, कथा प्रचलित है कि छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल से हुई थी। इस पर्व को सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके शुरू किया था। कहा जाता है कि कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों तक पानी में खड़े होकर उन्हें अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है।


¤  प्रकाशन परिचय  ¤

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अर्जुन केशरी

वरिष्ठ संवाददाता

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बाराचट्टी, गया (बिहार)

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देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड)

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