कवि राजीव कुमार झा से अनामिका मिश्रा की बातचीत

साहित्य नयी पीढ़ी की जीवन चेतना का आज भी प्रमुख हिस्सा है, वह इससे संस्कार अर्जित करती है...

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(देवभूमि समाचार)

झारखंड के जमशेदपुर की कवयित्री अनामिका मिश्रा ने हाल ही में कविता लेखन शुरू किया है. प्रस्तुत है इनसे राजीव कुमार झा की बातचीत !

प्रश्न : कविता लेखन आपने कब शुरू किया ?

उत्तर : मेरा झुकाव कविता लेखन की ओर 2020 से हुआ और यह कायम सोशल मीडिया पर हुआ। सब लोगों को मेरी कविताएं बहुत पसंद आईं और सब ने मेरा उत्साहवर्धन खूब किया जिससे मेरी रुचि और बढ़ती ही गई।

प्रश्न : आप अपने प्रिय लेखकों के बारे में बताएं?

उत्तर : मेरे प्रिय कवि और लेखकों के नाम हैं भारतभूषण जी, मैथिलीशरण गुप्त जी,महादेवी वर्मा जी,रामधारी सिंह दिनकर जी एवं मुंशी प्रेमचंद जी जिनकी कविताएं – कहानियां हम अपने पाठ्य पुस्तकों में पढ़ा करते थे।

प्रश्न : आप अपने घर परिवार के बारे में कुछ जानकारी दीजिए ?

उत्तर : मेरा बचपन झारखंड में ही बिता है, पर मेरी शिक्षा एक जगह नहीं हुई, क्योंकि मेरे पिता जी का स्थानांतरण होता रहता था, स्नातक पूरा करते हुए मेरा विवाह कर दिया गया था, मैं कॉमर्स लेकर पढ़ी हूं, कॉमर्स की छात्रा हूँ, कंप्यूटर कोर्स की हूं शार्ट हैंड टाइपिंग सीखी हूं, मैं बचपन से ही कहानियां बहुत पढ़ती थी बहुत अच्छी लगती थी मुझे कहानियां पढ़ना और हिंदी कविताओं को पढ़ना पर लिखने का तरीका मुझे नहीं पता था जो आज मैं सीखी हूं। दो-तीन वर्ष में बच्चों को ट्यूशन पढ़ायी हूं,घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से बाहर नौकरी करना संभव नहीं हो सका।

प्रश्न : आज हिंदी में गजल लेखन का खूब प्रचलन है . गजल पढ़ना – लिखना कितना अच्छा लगता है ।

उत्तर : साहित्य में ग़ज़ल बहुत ही अच्छी विधा है, पर इसके लिखने की जानकारी बहुत लोगों को नहीं है यह लिखने में तो कठिन लगता है,परंतु अगर समझ में आ जाए तो लिखना बहुत ही आसान है और रुचिकर होता है,मैं भी पहले नहीं जानती थी पर अब सीख गई हूं, और बेहतरीन लिखने लगी हूँ।

काव्य, में तो अनेकों विधाएं हैं जिसकी जानकारी मुझे अभी हुई है , इनमें दोहा, ग़ज़ल, घनाक्षरी भी मैं अब लिखने लगी हूं, परंतु कहते हैं ना हर क्षेत्र में अभ्यास बहुत ही आवश्यक है और लगन होनी चाहिए, यह लगन और अभ्यास ही हमें पारंगत बनाता है और बहुत से समूहों में रहकर भी मैं बहुत कुछ सीख पायी हूँ !



प्रश्न : कला के रूप में कविता के बारे में आपका क्या विचार है?

उत्तर : कविता बहुत ही सरस और सुंदर विधा है,जिसमें हम अपने मन के सारे भावों को पूर्णतया व्यक्त कर सकते हैं, और जितना भाव और रस उसने भरना चाहे भर सकते हैं उसकी कोई सीमा नहीं होती है,मापनी नहीं होती है,हम उन्मुक्त होकर कविता की रचना कर सकते हैं, और अपने पसंद के शब्द उसमें भी रोप सकते हैं, मोतियों की माला की तरह कविता की रचना होती है जो बहुत ही सुंदर और मन को भेदने वाली होती है, हम अपने जितने भाव उकेरना चाहें उसमें उकेर सकते हैं, कविता सचमुच लेखन की बहुत ही आसान विधा होती है।

प्रश्न : कविता के अलावा आपने और क्या लिखा है?

उत्तर : कविता के अलावा मैं कहानियां, लघुकथाएं ग़ज़ल दोहे घनाक्षरी भी लिखती रही हूं पर मुक्तछंद में कविता लिखना ही मुझे बहुत भाता है !



प्रश्न : अपनी पसंद की कोई अच्छी हिंदी कविता सुनाएं ?

उत्तर : रामधारी सिंह दिनकर के काव्यग्रंथ रश्मिरथी की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत कर रही हूं –

“जय हो जग में चले जहां भी,नमन पुनीत अनल को जिस नर में भी बसे हमारा,नमन तेज का बल को।
किसी वृंत्त पर खिले विपिन में, पर नमस्य है फूल, सुधी खोजते नहीं गुणों का, आदिशक्ति का मूल।”

दिनकर जी की उपरोक्त पंक्तियां मुझे बहुत ही अच्छी लगती हैं!

प्रश्न : आप मूल रूप से कहां के रहने वाले हैं और स्कूली जीवन आपका कैसा रहा।

उत्तर : हमारा घर बिहार के लखीसराय जिले में स्थित बड़हिया शहर के इंदुपुर मुहल्ले में है और कई पीढ़ियों से हमलोग यहां रह रहे हैं. मेरे पिता बिहार सरकार के अफसर थे और काफी समय तक बीडीओ के रूप में गोपालगंज जिले के भोरे प्रखंड के अलावा बेगूसराय जिले के साहेबपुर कमाल में तैनात रहे . भोरे में मैं काफी छोटा बच्चा था और यहां स्कूल नहीं जाता था . मेरा घर काफी बड़ा था और यह अंग्रेज़ों का बनवाया एक बड़ा मकान था.मैं इसके अहाते में दिनभर बड़े भाई के साथ खेलता रहता था .



वह मुझसे डेढ़ दो साल बड़े थे.दोपहर में यहां पास के गांव से कोई पंडित जी हमलोगों को आकर पढ़ाते थे. मेरी पढ़ाई साहेबपुर कमाल के रेलवे प्राइमरी स्कूल में शुरू हुई . यहां काफी छोटी उम्र में मैं अपने बड़े भाई संजीव कुमार झा और बड़ी बहन अन्नपूर्णा के साथ पढ़ने जाता था. यह एक छोटा सा सरकारी स्कूल था और उस समय इन छोटी जगहों पर बच्चों के प्राइवेट स्कूल काफी कम होते थे . मैंने यहां कुछ अक्षरज्ञान प्राप्त किया और पहली कक्षा में रानी मदन और अमर नामक हिंदी की किताब पढ़ता था . यहां स्कूल में छुट्टी से पहले हमलोग एक से बीस तक पहाड़ा एक साथ सभी छात्र दुहराया करते थे .

आगे मेरे पिता का तबादला वर्तमान झारखंड के धनबाद जिले में स्थित सिंदरी में हो गया .यह एक बड़ा शहर था और यहां शाहपुरा के सरकारी मिडिल स्कूल में मेरा नाम चौथी कक्षा में लिखवाया गया . यह काफी बड़ा सरकारी स्कूल था और शहर के विभिन्न मुहल्लों से छात्र यहां उस समय स्कूल बस से आते थे . मेरी छोटी बहन कृष्णा का नामांकन भी यहां हुआ वह पहली कक्षा की छात्रा के रूप में सुबह की पाली में पढ़ने जाती थी . मेरे पिता सिंदरी के नोटिफायड एरिया कमिटी के प्रशासनिक अधिकारी थे और फिर दो सालों के बाद उनका तबादला एक्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट के तौर पर सहरसा हो गया और हमलोग 1980 में यहां आ गये . मैंने छठी कक्षा में यहां अपना नाम जिला स्कूल में लिखवाया और मैट्रिक की परीक्षा भी यहीं से पास किया .

प्रश्न :बचपन में आपकी रुचि किसमें थी, आप क्या करना पसंद करते थे, आप क्या बनना चाहते थे?



उत्तर: बचपन में मेरी रुचि खेलने कूदने में काफी रहती थी और मुझे काफी नटखट बच्चा माना जाता था . किसी से लड़ाई झगड़ा करना मुझे नापसंद था और आज भी यह सब मुझे अच्छा नहीं लगता है . मैं जब थोड़ा बड़ा हो गया तो मुझे पेड़ पर चढ़ना भी अच्छा लगने लगा . सहरसा में पुरानी कचहरी के पास सरकारी मुहल्ले में मेरे घर के पास कई पुराने फलदार पेड़ थे और मैं अक्सर उन पर चढ़ जाता था और इसकी जानकारी मिलने पर घर के लोग फिर चिंतित होकर पेड़ के नीचे आकर मुझे सावधानी से उतरने के लिए कहते थे . इसके पहले जब मैं भोरे में था तब थावे के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर की छत पर से तालाब के किनारे गिर गया था.

मेरे माता- पिता उस समय पूजा पाठ कर रहे थे और मंदिर से छत की तरफ जाने वाली सीढ़ी को खुला पाकर अपने बड़े भाई के साथ छत पर जाकर वहां खेलने लगा था और फिर नीचे गिर गया था . इसके बाद बड़े भाई से जानकारी मिलने के बाद मेरे पिता सिपाही और पुजारी के साथ मंदिर के पिछवाड़े आकर तालाब के किनारे से गोद में उठाकर थावे के अस्पताल में ले गये और वहां माथे पर जहां जख्म हो गया था वहां के बाल काटकर डाक्टर ने स्टीच लगाया था.



यह सब मुझे याद है.सहरसा में बरसात के दिनों में मूसलाधार बारिश से जब मुहल्ले के तमाम गड्ढे पानी से भर जाते थे तो मैं अपने दोस्तों के साथ उनके किनारे जाकर पानी देखा करता था और अमरूद तोड़ने कलक्टर के आफिस में जाता था . मुझे हाई स्कूल में गणित , रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान की बातें समझ में नहीं आती थीं और गणित में भी मैं काफी कमजोर था लेकिन अन्य विषयों में विद्यालय के अच्छे छात्रों में मेरी गिनती होती थी .

तुलसीदास की जयंती के अवसर पर एक बार मैंने विद्यालय के समारोह में भाषण भी दिया था और इसमें डी.एम और एस.पी. के अलावा शहर के तमाम गणमान्य लोग मौजूद थे. मैंने भाषण देने से पहले काफी अभ्यास किया था और इसलिए मेरा चयन हुआ था . मैं बड़ा होकर हिंदी अथवा इतिहास का प्रोफेसर बनना चाहता था . मैट्रिक और इसके बाद कालेज की पढ़ाई के पहले साल में साहित्यिक किताबों को पढ़ने में मेरी रुचि कायम हुई और मैं सहरसा के जिला केन्द्रीय पुस्तकालय का नियमित पाठक बन गया था.



प्रश्न : आपकी कविताएं तो बहुत अच्छी हैं. मैंने उनको पढ़ा है,पर आज देख रही हूं,साहित्य में आज की पीढ़ी विशेष रुचि नहीं रख रही, साहित्य में समर्पण भाव को भी व्यावसायिक रूप दिया जा रहा है, इस विषय में मैं आपके विचार जानना चाहती हूं,
आप क्या कहना चाहेंगे?

उत्तर: आज भी नयी पीढ़ी साहित्य से पहले की तरह ही प्रेम और लगाव का भाव मन में रखती है . फेसबुक पर युवा उम्र के लोग काफी तादाद में रोज कविता पोस्ट किया करते हैं और काव्य लेखन में इनकी परिपक्वता को देखकर लगता है कि साहित्य से इनका पुराना प्रेम रहा है और यही बात मैं कहना चाहता हूं कि आज जीवन की जो नयी बातें हैं,नयी पीढ़ी निश्चित रूप से अब उनमें ही ज्यादातर रुचि ले रही है लेकिन साहित्य भी नयी पीढ़ी की अभिरुचि का प्रमुख क्षेत्र है !



फेसबुक पर युवा उम्र के लोग प्रेम से जुड़े मनोभावों को कविताओं में सुंदरता से पिरोते दिखाई देते हैं और फेसबुक कविता समूहों में भी खूब उत्साह से सभी भाग लेते हैं.साहित्य नयी पीढ़ी को आत्मिक संस्कार प्रदान करता है और समाज में मनुष्य के सुख-दुख के बारे में उन्हें बताता है.

साहित्य से अलग होने के बारे में वह कभी कुछ सोच भी नहीं सकते हैं क्योंकि हमारी जीवन संस्कृति का काव्य परंपरा से गहरा संबंध है. नयी पीढ़ी काव्य के सहारे ही ईश्वर , धर्म और आत्मा के बारे में ज्ञान प्राप्त करती है और वह सामाजिकता का पाठ पढती है .काव्य और साहित्य से ही उसमें नीति और बुद्धि – विवेक और देशप्रेम के अलावा विश्व बंधुत्व का भाव जाग्रत होता है !

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