भारत में विभिन्न धर्मों के त्यौहार धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक वातावरण, सांस्कृतिक परंपराओं और सामुदायिक जुड़ाव को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आलेख में त्यौहारों के नाम पर फैलने वाले अंधविश्वास, कुरीतियों, राग-द्वेष और राजनीतिकरण से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। लेखक के अनुसार त्यौहारों की वास्तविक महत्ता तभी कायम रह सकती है, जब उनमें सामाजिक समरसता और साम्प्रदायिक सौहार्द का समावेश हो।
- त्यौहारों की असली महत्ता कैसे कायम रहे
- त्यौहार जोड़ें, तोड़ें नहीं
- समरसता से बनी रहे त्यौहारों की गरिमा
- त्यौहारों में हो सौहार्द और सद्भाव
ओ.पी उनियाल
भारत त्यौहारों का देश है। हर धर्म के अपने-अपने त्यौहार हैं। बात की जाए धार्मिक त्यौहारों की तो पूरे वर्ष में सबसे अधिक त्यौहार हिन्दू धर्म में ही मनाए जाते हैं। त्यौहारों का उल्लास अलग ही होता है। श्रद्धा, आस्था, भक्तिभाव, पवित्रता से जुड़ाव होता है त्यौहारों का। इसके अलावा सामाजिक वातावरण एवं अपने धर्म के प्रति उन्मुखता बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं त्यौहार।
हर धर्म त्यौहारों को परंपरागत रूप से मनाता है। लेकिन परंपराओं की आड़ में कई बार त्यौहारों का स्वरूप बिगाड़ने की होड़ भी लगी रहती है। धार्मिक त्यौहारों के अवसर पर अक्सर धर्म के ठेकेदार अंधविश्वास, कुरीति, राग-द्वेष फैलाने, जीव हत्या करने जैसे कुचक्र रचने का अवसर ढूंढते रहते हैं। इनके जाल में अशिक्षित तो फंसते ही हैं, कई शिक्षित भी जकड़ जाते हैं। और अब तो त्यौहार भी राजनीतिकरण का शिकार होते जा रहे हैं।
हर त्यौहार मनाने का कोई न कोई उद्देश्य होता है। उससे हमें कुछ न कुछ प्रेरणा एवं सीख मिलती है। समाज के मार्गदर्शक के रूप में अहम भूमिका होती है त्यौहारों की। कुछ त्यौहार तो आजकल दो दिन मनाए जाने लगे हैं, जिससे अनिश्चितता व असमंजसता बनी रहती है। एक ही त्यौहार देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है। त्यौहार किसी भी धर्म का हो, उसमें सामाजिक समरसता, साम्प्रदायिक सौहार्द का समावेश हो, तभी उसकी महत्ता कायम रहती है।

