
यह कविता बताती है कि जब रिश्ते विश्वास तोड़ने लगें और शब्द बेअसर हो जाएँ, तब मौन आत्मरक्षा का सबसे सशक्त माध्यम बन जाता है। आत्मसम्मान, क्षमा और सत्य के महत्व को रेखांकित करती यह रचना संबंधों की वास्तविकता का संवेदनशील चित्रण करती है।
- जब मौन बन जाए सबसे बड़ा उत्तर
- रिश्तों में आत्मसम्मान की अहमियत
- छल के बीच सत्य और मौन की शक्ति
- विश्वास टूटे तो मौन ही संबल
डॉ. प्रियंका सौरभ
रिश्ते यदि हों घाव बन, बढ़े निरंतर पीर।
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
मन के भीतर टूटते, कितने मौन विहार।
अपने ही जब दे गए, विश्वासों पर वार॥
शब्द नहीं उपचार तब, चुप ही बने समीर—
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
हर उत्तर आवश्यक नहीं, हर झगड़ा नहीं जीत।
कुछ रिश्तों की हार में, छिपी हुई है प्रीत॥
दूरी भी उपचार है, जब बढ़ जाए पीर—
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
मीठे मुख के सामने, मन में यदि हो छेद।
ऐसे झूठे स्नेह से, अच्छा निर्मम भेद॥
सच की रक्षा कर सके, वही बने गंभीर—
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
क्षमा हृदय की शक्ति है, भूल नहीं हर बार।
स्वाभिमान के सामने, झुकता नहीं विचार॥
आत्मसम्मान के बिना, जीवन रहे अधीर—
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
‘सौरभ’ रिश्ते प्रेम से, पाते सदा विस्तार।
छल-कपट की धूप में, मुरझाते व्यवहार॥
जब सम्मान न बच सके, छोड़ो वह जागीर—
रिश्ते यदि हों घाव बन, बढ़े निरंतर पीर।
स्वयं बचाने मौन ही, बन जाता तब धीर॥
(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
डॉ. प्रियंका सौरभ
पीएचडी (राजनीति विज्ञान) कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)








