
आलेख में जीवन के मूल्यों, मुस्कुराहट की महत्ता और साहित्यकारों की सामाजिक जिम्मेदारी को सरल व प्रेरणादायक शैली में प्रस्तुत किया गया है। लेखक ने समय के अनुसार स्वयं को ढालने, सकारात्मक सोच अपनाने और समाज को सही दिशा देने की आवश्यकता पर बल दिया है।
- मुस्कुराहट से महकता है जीवन
- समय के साथ बदलना ही समझदारी
- साहित्यकारों की समाज के प्रति जिम्मेदारी
- ईमानदारी और जिम्मेदारी से मिलती सफलता
सुनील कुमार माथुर
जोधपुर, राजस्थान
आज वक्त की पुकार है कि जीवन को समय के अनुसार जीने में ही समझदारी है। चूंकि मनुष्य को वक्त के अनुसार अपने आपको ढालना चाहिए, अन्यथा हम पिछड़ जाएंगे। जो अपने आपको समय के अनुसार ढाल लेता है, वही सफलता की सीढ़ियां आसानी से चढ़ पाता है। किसी ने बहुत ही सुंदर बात कही है कि जीवन में चार वेदों का ज्ञान न हो तो भी चलता है, लेकिन समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और वफादारी इन चार बातों को जीवन में अपना लिया तो जीवन खुद ही सफल हो जाएगा। इसलिए हमें जीवन में कभी भी अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटना चाहिए। ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी को निभाते रहना चाहिए। याद रखिए, भरोसा बहुत ही महंगी चीज होती है, जो हर किसी पर नहीं किया जा सकता।
यूं ही मुस्कुराते रहिए
आप हमेशा यूं ही मुस्कुराते रहिए, कभी अपने लिए तो कभी अपनों के लिए। क्योंकि यह नश्वर संसार एक बगिया है, जहां हर कोई जबरदस्ती मुस्कान चेहरे पर ला रहा है, जो न खुशबू देती है और न ही उनमें अपनेपन का भाव है। जब आप दिल से मुस्कुराते हैं तो उसकी खुशबू दूर तक फैल जाती है और जन-जन के हृदय को आलोकित कर देती है तथा पराये भी अपने हो जाते हैं। चेहरे की मुस्कुराहट ही हमारा अनमोल रत्न है, जिसे न कोई चुरा सकता है, न ही कोई छीन सकता है और न ही इसका बंटवारा किया जा सकता है। यह अनमोल रत्न हमें कुदरत ने दिया है। मूर्ख तो हम ही हैं, जो मुस्कुराहट को उदासी में बदल रहे हैं। दुःख, पीड़ा, परेशानियां तो परमात्मा ने भी झेली हैं, फिर हम हर वक्त उदासी की जिंदगी क्यों जी रहे हैं। मुस्कुराहट हमें प्रकृति से मिली है, जो निशुल्क है, फिर मुस्कुराते रहने से परहेज क्यों। कहते हैं कि सलीके से हवाओं में जो खुशबू घोल देते हैं, अभी भी कुछ लोग बाकी हैं जो मुश्किलों में भी मीठा बोल लेते हैं।
साहित्यकारों की जिम्मेदारी
एक वक्त था जब लोग कहते थे कि शिक्षक न केवल ज्ञानदाता है, बल्कि एक माता के समान बालक के भीतर संस्कारों और चरित्र का निर्माण करने वाला होता है। चूंकि किसी भी राष्ट्र की पहचान उसके नागरिकों से होती है और उन नागरिकों के निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी शिक्षकों के कंधों पर होती है। लेकिन आज शिक्षक इस जिम्मेदारी से बहुत दूर हैं, क्योंकि उनका कहना है कि आदर्श संस्कारों और चरित्र निर्माण की जिम्मेदारी अभिभावकों की है और अभिभावक कहते हैं कि यह जिम्मेदारी शिक्षकों की है। हम उन्हें हर माह फीस के रूप में मोटी रकम किस बात की देते हैं। नतीजतन आज का बालक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां उसे सही दिशा देने वाला कोई नहीं है।
बालकों के चरित्र निर्माण व राष्ट्र का भावी नागरिक बनाने का कार्य आज का साहित्यकार कर रहा है। वह बच्चों को अनुशासित, ईमानदार, निष्ठावान और देशभक्त नागरिकों का निर्माण एक समर्पित साहित्यकार की हैसियत से कर रहा है। साहित्यकार हर वक्त केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं लिखता है, अपितु बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए भी समर्पित भाव से निस्वार्थ भाव से लेखन कर्म कर रहा है। धन्य है उनकी लेखनी को, जो राष्ट्र की मुख्यधारा से कटे लोगों को सही दशा व दिशा दिखा रही हैं।
सुनील कुमार माथुर
जोधपुर, राजस्थान





