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ठीक उसी प्रकार स्याही, कलम व कागज—तीनों बाल साहित्य सृजन के लिए विचारों को आमंत्रित कर, मिलकर जिस तरह साथ निभाते हुए लिखते हैं, उसमें आप तीनों का अमूल्य योगदान रहता है। यह सुनकर स्याही, कलम और कागज एक-दूसरे के गले लगकर एक हो गए।
सुनील कुमार माथुर
रविवार का दिन था। सुनील, चेतन व चांद मोहम्मद धूप में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे और साहित्य सृजन पर विचार-विमर्श कर रहे थे। तभी कलम, स्याही और कागज भी आ गए। वे भी चर्चा में शरीक हो गए। सभी श्रेष्ठ बाल साहित्य सृजन पर चर्चा कर रहे थे, तभी न जाने कलम को क्या हो गया कि वह जोर-जोर से स्याही व कागज का विरोध करने लगी।
तीनों के बीच बात बिगड़ती देख कर सुनील, चेतन व चांद मोहम्मद एकदम चुप हो गए। कलम ने अहंकार में भरकर कहा कि मैं हूं तभी कागज व स्याही की इज्जत है, वरना इन्हें कौन पूछता है। यह सुनकर स्याही ने कहा कि कलम, इतना मत इतराओ। तुम नहीं थी तब भी हम थे और तुम्हारे स्थान पर पेड़ की एक नुकीली सींक लिखने के काम आती थी। कागज ने भी स्याही का साथ दिया।
इस पर कलम को इतना क्रोध आया कि वह आपे से बाहर हो गई और कागज को फाड़कर फेंक दिया। घायल व जख्मी कागज इस पर चुप्पी साध कर बैठ गया। तभी सुनील ने कलम को समझाते हुए कहा— “कलम भैया! इतना क्रोध मत कीजिए। सकारात्मक सोच रखिए और तनिक ठंडे दिमाग से सोचिए। तुम तीनों कोई अलग नहीं हो। सभी का अपना-अपना काम है। सभी अपनी-अपनी जगह अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं। जिस प्रकार शरीर के किसी एक भाग में पीड़ा होती है, तो पूरा शरीर उस पीड़ा को झेलता है। भले ही वे अपने मुख से कुछ न बोलें, लेकिन चेहरा सब कुछ बता देता है।”
ठीक उसी प्रकार स्याही, कलम व कागज—तीनों बाल साहित्य सृजन के लिए विचारों को आमंत्रित कर, मिलकर जिस तरह साथ निभाते हुए लिखते हैं, उसमें आप तीनों का अमूल्य योगदान रहता है। यह सुनकर स्याही, कलम और कागज एक-दूसरे के गले लगकर एक हो गए।
तब से आज तक वे एक साथ हैं और हर रोज श्रेष्ठ बाल साहित्य सृजन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। यह सब सकारात्मक सोच का ही परिणाम है। जहां सकारात्मक सोच होती है, वहां क्रोध, अहंकार और घमंड नहीं होता। वहां केवल शांति, प्रेम, स्नेह, सहनशीलता, क्षमा, धैर्य, त्याग, ममता और वात्सल्य भाव जैसे गुण होते हैं।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच, (स्वतंत्र लेखक व पत्रकार) जोधपुर, राजस्थान







